आम भाषा में समझें तो कृष्णा-गोदावरी (केजी) बेसिन कच्चे तेल और गैस की खान है जो आंध्र प्रदेश की दो प्रमुख नदियों कृष्णा और गोदावरी के डेल्टा क्षेत्र में स्थित है। तेल के यह क्षेत्र करीब 50 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले हैं जिसमें से 21,000 वर्ग किलोमीटर का इलाका जलीय क्षेत्र में है, जबकि 28,000 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र तटवर्ती क्षेत्र में है।
रिलायंस कैसे आई केजी बेसिन में
तेल क्षेत्र मूल रूप से सरकारी नियंत्रण वाली पीएसयू कंपनियों के पास रहीं। 1997-98 में सरकार न्यू एक्सप्लोरेशन और लाइसेंस पॉलिसी (एनईएलपी या नेल्प) लेकर आई। इस पॉलिसी का मुख्य मकसद तेल खदान क्षेत्र में लीज के आधार पर सरकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियों को एक समान अवसर देना था। इस नीति के तहत रिलायंस ने बोली में तेल ब्लॉक लिए।
नेल्प के नियम में कहा गया था कि निजी ऑपरेटर सरकार के साथ एक प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रेक्ट (पीएससी) पर हस्ताक्षर करेगा। इसके नियमों व शर्तों के तहत उसके राजस्व में सरकार भी साझीदार होगी। फरवरी, 1999 में अविभाजित आरआईएल ने कृष्णा गोदावरी बेसिन में नेल्प के पहले दौर में केजी डीडब्ल्यूएन 98.3 ब्लॉक हासिल किया था।
वादे और हकीकत
रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने वर्ष 2006 में केजी डी6 के धीरुभाई-1 और धीरुभाई-3 क्षेत्र में अप्रैल 2011 तक 22 कुओं की खुदाई कर प्रतिदिन छह करोड़ 18 लाख 80 हजार घनमीटर और 2012 तक 31 कुओं की खुदाई कर प्रतिदिन आठ करोड़ घनमीटर प्राकृतिक गैस उत्पादन का वादा किया था। इसके लिये कंपनी को क्षेत्र में आठ अरब 83 करोड़ 60 लाख डालर निवेश की अनुमति दी गई थी। इस क्षेत्र में सितंबर 2008 में तेल और अप्रैल 2009 में गैस का उत्पादन शुरू किया गया था।
-जमीनी सच्चाई यह है कि धीरुभाई-1 और 3 के 18 कुओं से कंपनी प्रतिदिन चार करोड़ 20 लाख घनमीटर गैस का ही उत्पादन कर पा रही है जबकि क्षेत्र के ही अन्य एमए तेल क्षेत्र से 80 लाख घनमीटर प्रतिदिन गैस का उत्पादन अलग से किया जा रहा है।
विवाद की टाइमलाइन
28 अप्रैल, 2011 : केजी बेसिन में रिलायंस इंडस्ट्रीज की परियोजना से गैस उत्पादन में गिरावट आई और सरकार ने रिलायंस को गैर-प्राथमिक क्षेत्रों को गैस की आपूर्ति बंद करने का आदेश दिया
12 मई, 2011 : इस्पात निर्माता कंपनियों ने गैस आपूर्ति में कटौती के मंत्रालय के निर्णय की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह का निर्णय लेने का अधिकार केवल मंत्री समूह को है
13 अक्तूबर, 2011 : कैग ने मंत्रालय को पत्र लिखकर केजी बेसिन क्षेत्र के मामले में सतर्क रहने का सलाह देते हुए कहा कि केजी-डी6 की लेखा परीक्षा पूरी होने के बाद ही रिलायंस को व्यय वसूली की अनुमति देनी चाहिए
15 दिसंबर, 2011 : पेट्रोलियम मंत्री एस जयपाल रेड्डी ने संसद को सूचित किया कि केजी-डी6 ब्लॉक में कम से कम छह कुंओं से गैस का उत्पादन बंद हो गया है। रिलायंस ने मंत्रालय को दी साप्ताहिक रपट में कहा कि धीरुभाई अंबानी-एक व तीन गैस क्षेत्र व एमए तेल क्षेत्र से प्राकृतिक गैस का उत्पादन 4 दिसंबर को समाप्त सप्ताह में 3.98 करोड़ घन मीटर प्रतिदिन रहा।
14 फरवरी, 2012 : पेट्रोलियम मंत्री एस जयपाल रेड्डी ने कहा कि सरकार रिलायंस को उसके केजी-डी6 गैस क्षेत्र में लागत वसूली में कटौती को लेकर नोटिस भेज सकती है क्योंकि कंपनी ने योजना के विपरीत अभी कुछ ही कुओं की खुदाई की है। रेड्डी ने कहा कि हम नोटिस भेजने के बारे में कानूनी सलाहकारों से राय ले रहे हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय तथा उसकी तकनीकी इकाई डीजीएच ने आरोप लगाया कि उत्पादन में कमी का कारण योजना के विपरीत सीमित संख्या में कुओं की खुदाई करना है। इस क्षेत्र से उत्पादन फिलहाल 7.039 करोड़ घन मीटर गैस प्रतिदिन की बजाए 3.45 करोड़ घन मीटर प्रतिदिन हो रहा है, जबकि इसे अप्रैल तक 8 करोड़ घन मीटर प्रतिदिन करने की योजना थी।
14 अक्तूबर, 2012 : रिलायंस ने केजी डी6 में गैस भंडार में गिरावट के मद्देनजर इसमें पूंजी निवेश में तीन अरब डॉलर से अधिक कटौती का प्रस्ताव किया
17 अक्तूबर, 2012 : पेट्रोलियम मंत्रालय ने पीएमओ को सूचित किया कि उसने केजी डी6 क्षेत्र से गैस का उत्पादन बढ़ाने की रिलायंस की योजना को अंतिम मंजूरी इसलिए नहीं दी, क्योंकि कंपनी ने कैग को अपने खर्चों का अंकेक्षण करने की अनुमति देने से मना कर दिया।
31 अक्तूबर, 2012 : कैग द्वारा ऑडिट की प्रकृति और दायरे को लेकर मतभेद के बाद कैग की बैठक टली। कैग ने केजी डी6 गैस ब्लॉक के दूसरे दौर की लेखा परीक्षा शुरू करने के लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज और पेट्रोलियम मंत्रालय के साथ शुरुआती बैठक बुलाई थी। इसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज के केजी-डी6 क्षेत्र में 2008-09 और 2011-12 में किए गए खर्च की लेखा परीक्षा की जानी है।
ऑडिट के तरीके पर विवाद
रिलायंस ने यह लिखित आश्वासन मांगा था कि कैग की लेखा परीक्षा केवल उत्पादन भागीदारी करार (पीएससी) के तहत सिर्फ बहीखातों और रिकार्ड तक सीमित होगी, कंपनी को पीएससी के तहत लेखा प्रक्रियाओं की धारा 1.9 से अलग कोई दस्तावेज उपलब्ध कराने को नहीं कहा जाएगा और न ही किसी तरह का स्पष्टीकरण मांगा जाएगा।
इसके साथ ही कंपनी ने यह शर्त भी रखी कि लेखा परीक्षा उसके परिसर में होनी चाहिये और रिपोर्ट को पीएससी के तहत पेट्रोलियम मंत्रालय को सौंपी जाए, संसद को नहीं। जबकि मंत्रालय ने जोर देकर कहा था कि कंपनी कैग को अपने बही खातों को बिना किसी रुकावट के दिखाए। इसके लंबित रहने तक मंत्रालय ने कंपनी के निवेश प्रस्तावों को मंजूरी रोकी हुई है।