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देशद्रोह कानून: कन्हैया के अलावा कौन आया घेरे में

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जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी को लेकर सियासत गरमाई हुई है।
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जेएनयू में 10 फरवरी को अफजल गुरु की याद में आयोजित कार्यक्रम के दौरान देश विरोधी नारे लगाने के आरोप में कन्हैया कुमार को गिरफ्तार किया गया है।

उन पर भारतीय कानून के अनुच्छेद 124 ए के तहत देशद्रोह का आरोप लगाकर गिरफ्तारी की गई। फिलहाल दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने कन्हैया कुमार को 2 मार्च तक के लिए न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया है।

इस बीच देशभर में देशद्रोह कानून को लेकर फिर से चर्चा शुरू हो गई है। आखिर किन परिस्थितियों में इस कानून के तहत कार्रवाई की जाती है। साथ ही अब तक किस-किस पर इस कानून के तहत कार्रवाई हुई है बताते हैं आगे।
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आखिर क्या है देशद्रोह कानून

देश के खिलाफ की गई बयानबाजी और साजिश रचने जैसे मुद्दे को लेकर देशद्रोह कानून बनाया गया। यह एक उपनिवेशीय कानून है। जिसे ब्रिटिश राज में बनाया गया था। जिसे भारतीय संविधान में भी अपना लिया गया था। भारतीय कानून की धारा 124ए के तहत देशद्रोह की परिभाषा दी गई।

इस धारा के तहत बताया गया है कि अगर कोई व्यक्ति सरकार-विरोधी सामग्री लिखता है या बोलता है या फिर ऐसी सामग्री का समर्थन भी करता है तो उसे आजीवन कारावास या तीन साल की सजा हो सकती है। हालांकि ब्रिटेन ने ये कानून अपने संविधान से हटा दिया। लेकिन भारतीय संविधान में अभी भी इसकी मान्यता है।

इस कानून का इस्तेमाल उन हालात में होता है जब कोई व्यक्ति या संगठन देश विरोधी कार्यों में लिप्त पाया जाता है। इस मामले में गिरफ्तार किए गए शख्स पर कोर्ट में सुनवाई होती है। अगर उस पर लगे आरोप साबित हो जाएं तो उन्हें उम्र कैद से लेकर फांसी तक की सजा हो सकती है।

इन पर लगे थे देशद्रोह के आरोप

कन्हैया कुमार पहले ऐसे शख्स नहीं हैं जिन पर देशद्रोह के आरोप लगे हैं। उनसे पहले भी कई लोगों पर ऐसे आरोप लगे।

इनमें जानी-मानी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति राय, भारतीय बाल रोग विशेषज्ञ और मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन, कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी और गुजरात में पाटीदार आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हार्दिक पटेल का नाम शामिल है।

हालांकि हार्दिक पटेल और कन्हैया कुमार के मामले को छोड़ दें तो बाकी सभी पर देशद्रोह के आरोप का साबित नहीं हुआ। वहीं बिनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा मिली थी। लेकिन फिर सुप्रीम कोर्ट से उन्हें राहत मिली।

देशद्रोह के आरोप में हार्दिक पटेल जेल में

जानी-मानी लेखिका, बुकर पुरस्कार विजेता और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति राय को साल 2008 में देशद्रोह का आरोप लगा। दरअसल, उन्होंने कश्मीर में अलगाववादियों के कश्मीर आजादी की मांग का समर्थन किया था। जिसका खासा विरोध हुआ और उन पर देशद्रोह के आरोप लगा दिया गया।

कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी पर भी देशद्रोह का आरोप लगा। अन्ना आंदोलन के दौरान उनके बनाए गए कार्टूनों का विरोध हुआ। उनके कार्टूनों में राष्ट्रीय चिन्हों के अपमान, संविधान को नीचा दिखाने और देशद्रोही सामग्री छापने के आरोप में गिरफ्तारी हुई। लेकिन भारी विरोध के बाद सरकार ने देशद्रोह का केस हटा दिया था।

मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन पर भी देशद्रोह का आरोप लगा। नक्सलियों के समर्थन के आरोप में  उन पर ये कार्रवाई हुई। जिसमें कोर्ट ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि बाद में बिनायक सेन सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। जहां से उन्हें रिहाई मिली।

हाल ही गुजरात में पाटिदार आंदोलन का नेतृत्व करने वाले हार्दिक पटेल पर भी देशद्रोह के आरोप में कार्रवाई की गई है। फिलहाल मामला कोर्ट में है और हार्दिक जेल में बंद हैं।
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देशद्रोह कानून पर उठते रहे हैं सवाल

देश के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों पर लगाम के लिए देशद्रोह कानून बनाया गया। जिससे कोई भी देश विरोधी गतिविधियों का समर्थन नहीं कर सके। वहीं दूसरी ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भी संविधान ने दिया है।

इन्ही दोनों मुद्दों को लेकर अकसर टकराव होता रहा है। जिन पर भी ये आरोप लगते हैं, मानवाधिकार से जुड़े लोग और संस्थाएं इसकी आलोचना करने लगती हैं। ये कहा जाता है कि देशद्रोह कानून की आड़ में सरकारें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को निशाना बनाती हैं। वैसे भी इस मुद्दे पर अंतराष्ट्रीय स्तर भी सवाल खड़े होते रहे हैं।

हालांकि इस मुद्दे पर कानूनी जानकारों की मानें तो देशद्रोह बड़ा अपराध है। इसमें सजा के प्रावधान भी है। अगर भारतीय संविधान के अनुसार प्रत्येक नागरिक को संवैधानिक तरीके से सरकार की गतिविधियों या क्रियाकलापों का विरोध करने का अधिकार प्राप्त है लेकिन देश की सत्ता को गैरकानूनी तरीके से चुनौती नहीं दी जा सकती है।
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