आजादी पाने की राह में केंद्र की बाधाओं का सामना कर रही सीबीआई ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में दावा किया कि उसे सरकारी नौकरशाही के चंगुल से मुक्त कराए जाने की जरूरत है।
जांच एजेंसी ने कहा कि कार्यप्रणाली में स्वायत्तता पाने के रास्ते में अभी कई अड़चनें हैं। हमें बाबूगिरी से आजादी की जरूरत है।
जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष एजेंसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि केंद्र सरकार निदेशक को सचिव स्तर के अधिकार देने के खिलाफ है जबकि ऐसा करने से सीबीआई के कार्य में स्वतंत्रता सुनिश्चित होगी। हमें इस बाबूगिरी से आजादी की जरूरत है।
तब पीठ ने उनसे पूछा कि वह नौकरशाही के इतना खिलाफ क्यों हैं। तब सीबीआई ने कहा कि ऐसा इसलिए है क्योंकि हम जो मांग रहे हैं, वह वापस आ जाता है और हरेक प्रस्ताव शीर्ष बाबुओं से होकर गुजरता है।
दरअसल सीबीआई ने अदालत को उस प्रस्ताव की याद दिलाई जिसमें एजेंसी के निदेशक को सचिव स्तर का दर्जा देने और कार्मिक विभाग से गुजरे बगैर सीधे तौर पर मंत्री को रिपोर्ट करने की मांग की गई है।
सर्वोच्च अदालत ने अटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती से इस मुद्दे पर स्पष्ट बयान देने को कहा। इस पर अटॉर्नी जनरल ने पीठ से कहा कि संबंधित प्राधिकार से निर्देश लेने के बाद ही वह इस पर बयान दे सकते हैं।
इस पर जांच एजेंसी के वकील ने कहा कि केंद्र एजेंसी के इस प्रस्ताव पर या सीधे तौर पर विशेष अधिवक्ता नियुक्त करने का अधिकार निदेशक को देने पर सहमत नहीं। जबकि अन्य पुलिस फोर्स के महानिदेशकों को सचिव स्तर की शक्तियां सरकार की ओर से निहित की गई हैं।
तब पीठ ने अटॉर्नी से कहा कि वह इन दो मुद्दों पर स्पष्ट पक्ष रखें। साथ ही सर्वोच्च अदालत ने पूछा कि दिल्ली विशेष पुलिस इस्टैबलिशमेंट अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन का क्या हुआ। वह भी महत्वपूर्ण है।
तमाम विधेयक संसद की ओर से पास किए गए हैं। क्या उनमें से कोई प्रस्तावित विधेयक सीबीआई की स्वायत्तता से संबंधित भी था।
वाहनवती ने जवाब में कहा कि मानसून सत्र में ऐसा कोई विधेयक नहीं था लेकिन इस पर कार्य प्रगति पर है। पीठ ने इस पर केंद्र को दो सप्ताह के भीतर औपचारिक आदेश जारी करने को भी कहा।
साथ ही अदालत ने सीबीआई के उस आग्रह को भी अनुमति प्रदान कर दी जिसमें तीन और अधिकारियों को जांच दल में शामिल करने की मांग की गई थी। अब इस दल में कुल 36 अधिकारी होंगे जिनमें इंस्पेक्टर रैंक के तीन अधिकारी शामिल रहेंगे।
सीबीआई ने 16 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि एजेंसी के निदेशक का कार्यकाल कम से कम तीन साल किए जाने और निदेशक को सचिव स्तर का अधिकार देने समेत वित्तीय स्वायत्तता दिए जाने का आग्रह किया था। हालांकि केंद्र की ओर से इन प्रस्तावों को नकार दिया गया था।