गलियों और गलियारों में चार महीना तक न तो ढोल और नगाड़े की गूंज सुनाई देगी और न ही बैंडबाजों की धुन पर दूल्हे के यार-दोस्तों के साथ उसके नाते और रिश्तेदार थिरकते नजर आएंगे। पंडित जी कहते हैं कि देवोत्थान तक कोई शुभ मुहूर्त नहीं निकलने वाला।
शादी करने को नवंबर तक के इंतजार के साथ ही मंगलवार तड़के तक सात फेरे लेकर उन सभी नए जोड़ों ने विदा लेकर भड़रिया नौमी को अलविदा कह दिया।
शादी-समारोह की अबूझ तिथियों में यूं तो अक्षय तृतीया, देवोत्थान एकादशी, फुलौरा दौज और बंसत पंचमी शामिल हैं लेकिन पंडितों की माने तो सर्वाधिक शादियां भड़रिया नौमी के दिन होती हैं। भड़रिया नौमी इस बार सोमवार को भी मानी गई।
मंगलवार से देवशयनी एकादशी
इसके पीछे जानकारों का तर्क है कि सोमवार तड़के पांच बजकर 55 मिनट पर सूर्य उदय हुआ। रविवार से लगी भड़रिया नौमी का समय अगले दिन सुबह छह बजकर 22 मिनट तक रहा, सो भड़रिया नौमी की तिथि में ही सूर्य उदय की वजह से शादियां हुईं।
ऐसा माना जाता है कि जिन लड़के और लड़कियों की शादी का मुहुर्त शुभ तिथियों में नहीं निकल पा रहा हो, उनकी शादी बिना कुछ सोचे-विचारे अबूझ तिथियों में कर दी जाती है। मंगलवार से देवशयनी एकादशी शुरू हो गई है। देवशयनी एकादशी से ही चातुर्मास शुरू हो जाता है।
चातुर्मास काल में देवता शयन करते हैं। ऐसे में शादियों का शुभ मुहुर्त नहीं निकलता। शुभ मुहूर्त की अगली अबूझ तिथि देवोत्थान एकादशी यानि तीन नवंबर को है। तीन तारीख के बाद नवंबर महीना में सात फेरे लेने को कोई भी शुभ मुहूर्त नहीं है।
सबसे अहम है देव विवाह
आचार्य प्रवीण शर्मा कहते हैं कि विवाह चार प्रकार के होते हैं। देव विवाह सबसे अहम है। मतलब-लड़का और लड़की के साथ दोनों के मां-बाप समेत घरवाले रजामंद हों। कन्या के मां-बाप खुद अपनी इच्छा से शादी कर आशीर्वाद प्रदान करें तो उसे बृह्म विवाह कहा जाता है। पैशाच्य विवाह को यूं कहिए कि लड़की की इच्छा के विपरीत शादी कर दी गई। गंदर्भ विवाह के मानी लव मैरिज होती है।
शादी के अब ये शुभ मुहूर्त
मध्य प्रदेश के भवानी शंकर के पंचांग के अनुसार 23 नवंबर, छह दिसंबर, 29 और 30 जनवरी, 8,10 और 45 फरवरी, 7,9 और 10 मार्च को शादियों को शुभ मुहूर्त मुकर्रर हैं।