3600 करोड़ रुपये के वीवीआईपी हेलीकॉप्टर सौदे में कथित तौर पर दलाली देने के मामले की तह तक पहुंचने में वायुसेना के अधिकारी और रक्षा लेखा विभाग के अधिकारी भी सीबीआई की मदद करेंगे। जांच एजेंसी ने अपनी शुरुआती रिपोर्ट में जिन संदिग्धों को नामजद किया है, उनसे पूछताछ करनी शुरू कर दी गई है।
सीबीआई के सूत्रों का कहना है कि वायुसेना और रक्षा लेखा महानियंत्रक के अधिकारी जल्द ही सीबीआई की जांच टीम में शामिल होंगे और मिलान से फिनमेकानिका और उसकी अगस्ता वेस्टलैंड से इकठ्ठे किए गए दस्तावेजों की जांच करेंगे।
सीबीआई की इस विशेष टीम में आयकर विभाग के भी अधिकारी होंगे, जो हेलीकॉप्टर के लिए निर्देश को बदलने की जरूरत और पैसों के लेन-देन की जांच करेंगे। सीबीआई ने अपनी प्रिल्यमिनरी जांच (पीई) में पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी और उनके तीन भाइयों समेत 11 लोगों को नामजद किया है।
सूत्रों ने बताया कि सीबीआई पहले ऐरोमेट्रिक्स और आईडीएस इन्फोटेक के अधिकारियों से पूछताछ की जाएगी, उसके बाद त्यागी और उनके भाइयों से सवाल किए जाएंगे। रक्षा मंत्रालय ने सीबीआई को सभी दस्तावेज सौंप दिए हैं, जिसमें अगस्ता वेस्टलैंड द्वारा भेजा गया नोटिस का जवाब भी शामिल है।
हेलीकॉप्टर में बदलाव से 300 करोड़ का बढ़ा भार
वर्ष 2009 में वीवीआईपी हेलीकॉप्टर में सीटों की संख्या बढ़ाने और चिकित्सा निकास प्रणाली शामिल करने की वजह से इस विवादित डील में भारतीय राजकोष पर 300 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ा था।
वायुसेना के सूत्रों के अनुसार सौदे से जुड़े दस्तावेजों की जांच में पता चला कि वीवीआईपी के लिए सीटों की संख्या दो से बढ़ाकर चार की गई और साथ ही चिकित्सा निकास प्रणाली को शामिल किया गया, इससे सौदे की कीमत में 300 करोड़ रुपये की वृद्धि हो गई।
यह प्रस्ताव 2009 में उस समय दिया गया, जब 12 हेलीकॉप्टरों के लिए अगस्ता वेस्टलैंड को पहले ही चुन लिया गया था। सितंबर, 2008 से लेकर 21 जनवरी, 2009 के बीच कांट्रेक्ट बातचीत के चरण पर था, उसी समय वायुसेना मुख्यालय ने कई अन्य तरह की सुविधाओं को भी शामिल करने की सिफारिश की थी। एसपीजी और प्रधानमंत्री कार्यालय ने हेलीकॉप्टर में चिकित्सा निकास प्रणाली शामिल करने को कहा था।
इस बीच यह भी पता चला है कि डील में भारतीय फर्म को शामिल करने की शर्त को पूरा करने के लिए चंडीगढ़ की डीएस इंफोटेक को शामिल किया गया था, लेकिन बाद में उसने अपना नाम वापस ले लिया।
रक्षा सौदा प्रक्रिया के अनुसार अगर कोई विदेशी कंपनी 300 करोड़ से ज्यादा की डील हासिल करती है, तो उसे भारतीय रक्षा कंपनी में 30 फीसदी का निवेश करना होगा।
माना जा रहा है कि इस फर्म का इस्तेमाल यूरोप के मिडिलमैन ने सौदे से जुड़े भारतीयों को 362 करोड़ रुपये पहुंचाने में किया गया।