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'विश्वरूपम' विवाद से आहत कमल हासन की आपबीती

Sun, 03 Feb 2013 12:10 AM IST
नई दिल्ली/कमल हासन
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'विश्वरूपम' को लेकर हो रही राजनीति से मैं काफी निराश और आहत हूं। मैं रोया भी। लेकिन मैं पैसे के लिए नहीं रो रहा हूं। सवाल पैसों का नहीं है। एक कलाकार अपनी फिल्म इसलिए बनाता है कि लोग उस फिल्म को देखें। लेकिन फिल्म जब बिना किसी बात के विवाद में आती है, तो इस बात का दुख होता है।
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मैं कलाकार हूं इसलिए रो रहा हूं। मैं नेता नहीं हूं और मुझे कोई वोट नहीं बटोरना है। मुझे राजनीति में नहीं आना है और मैं किसी चुनाव की तैयारी नहीं कर रहा हूं। लेकिन जिस तरीके से मेरी फिल्म ''विश्वरूपम'' को लेकर विवाद खड़ा किया गया, उससे मैं रो रहा हूं, क्योंकि मैं कलाकार हूं।

फिल्म दिखाने को लेकर हो रहे प्रदर्शनों और विवादों ने मेरे उत्साह पर पानी फेर दिया। अभिव्यकि्त की आजादी पर जिस ढंग से दबाव बनाया जा रहा है, उसे बहुत शुभ नहीं कहा जा सकता। क्या सेकुलर होने का मतलब हम भूल गए है! मैंने हमेशा हर धर्म और मजहब का  सम्मान किया है।
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आप फिल्म देखिए, मैंने किसी धर्म, समाज और कौम को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं की। एक कलाकार तो चाहता है कि ज्यादा से ज्यादा लोग उसकी फिल्मों को देखें। हां, कभी-कभी अच्छी ओपनिंग के लिए विवाद को भी सहारा बनाते हैं लोग, लेकिन मैं उनमें से नहीं हूं।

कुछ लोग कहने लगे थे कि मैं अपनी इस फिल्म के लिए मुफ्त की पब्लिसिटी चाहता हूं, इसलिए यह विवाद मेरा ही खड़ा किया हुआ है। पर मैं यह प्रश्न उन लोगों से पूछना चाहता हूं कि अगर मैं अपनी पब्लिसिटी इस तरीके से चाहता हूं, तो उसकी कीमत देश की बदनामी के रूप में कैसे संभव हो सकती है?

फिल्मी दुनिया से मेरा रिश्ता 1973 से है। साउथ की फिल्म ‘अरंगेत्रम’ से मैंने फिल्मी कॅरियर की शुरुआत की थी और तब से आज तक सिनेमा के लिए जी रहा हूं। सिनेमा के लिए सांस ले रहा हूं। मैंने फिल्म निर्माण के सभी क्षेत्रों में हाथ आजमाया है।

निर्देशन किया, गीत लिखे, कोरियोग्राफर बना, स्क्रीनप्ले लिखा और स्टोरी लिखने में भी खुद को आजमाया। विश्‍वरूपम मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट है। इसके सीक्वल की रूपरेखा भी मेरे पास है, लेकिन विवाद से एक पल के लिए मुझे लगा कि मेरा एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट बरबाद हो सकता है। तभी हताशा में, गुस्से में, खीझ में और लगभग रोते हुए मुझे लगा कि मैं तमिलनाडु छोड़कर देश में कश्मीर से लेकर केरल तक किसी सेकुलर राज्य में चला जाऊं।

अगर देश में ऐसी जगह नहीं मिली, तो मैं देश छोड़ दूं। जब एम एफ हुसैन ऐसा कर सकते हैं, तो मैं कमल हासन क्यों नहीं कर सकता? मैं एक कलाकार हूं और अपने रहने के लिए मैं सेकुलर निवास का चुनाव कर सकता हूं। मेरी पूरी जिंदगी, पूरा फिल्मी करिअर दांव पर लगा है।

मैंने अपनी सारी जमा-पूंजी इस फिल्म के निर्माण में लगा दी है, जिसकी लागत करीब 100 करोड़ है। हालांकि मेरे चेहरे पर उस समय मुस्कान आ गई थी, जब हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने फिल्म के प्रदर्शन से पाबंदी हटा दी थी।

पर मेरा मानना है कि मैं और मेरे मुस्लिम दोस्त एक राजनीतिक खेल का उपकरण बन चुके हैं। मैं नहीं जानता कि कौन यह खेल खेल रहा है और इसके पीछे दिमाग भी नहीं लगाना चाहता। मेरा बीता कल गवाह है कि मैंने बिना किसी ऊंच-नीच के अपनी इमेज को बरकरार रखने की कोशिश की है।

मैं अपने विरोधियों से कहना चाहता हूं कि वे पहले फिल्म देखें, उसके बाद तय करें कि क्या सही है और क्या गलत? बवाल बढ़ता जा रहा था, इसलिए मैंने फिल्म के आपत्तिजनक लगने वाले दृश्यों के संपादन पर अपनी सहमति दे दी है। पर यह सही नहीं है, क्योंकि मैंने फिल्म में किसी धर्म के विरुद्ध कुछ भी दिखाने का प्रयास कतई नहीं किया है।

इस तरह का सांस्कृतिक आतंकवाद बंद होना चाहिए, वरना यह आने वाले समय में देश व समाज के लिए घातक हो सकता है। कोई भी देशभक्त मुसलमान अगर मेरी फिल्म देखेगा, तो वह सराहना ही करेगा, ऐसा मेरा दावा है। पर कुछ छोटे-छोटे राजनीतिक दल इस तरह के मौकों की ताक में रहते हैं, ताकि वह अपने राजनीतिक स्वार्थ को साध सकें।  

मैं अपने फैन्स और दोस्तों का शुक्रगुजार हूं कि उनका इतना सपोर्ट मुझे मिला। उत्तर भारत में ‘विश्वरूप’ को लोग पसंद कर रहे हैं। विदेशों में भी काफी तारीफ हो रही है। तमिलनाडु में भी मेरे प्रशंसक फिल्म का इंतजार कर रहे हैं।

अब कुछ सीन के एडिट होने के बाद रास्ता निकल गया है। मैं सबका शुक्रगुजार हूं और आग्रह करता हूं कि इस विवाद के बाद मेरे बारे में कोई राय बनाने से पहले ‘'विश्वरूपम'’ को जरूर देख लें। मैंने किसी को दुखी करने का काम नहीं किया है।
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