जाने-माने साहित्यकार और पत्रकार वीरेन डंगवाल नहीं रहे। देश भर में अपने हजारों चाहने वालों से सोमवार को तड़के उन्होंने हमेशा के लिए विदा ले ली। लंबे समय से दिल्ली में रहकर कैंसर का इलाज करा रहे वीरेन डंगवाल पिछले रविवार को ही अपनी कर्मभूमि बरेली लौटे थे। इसके अगले ही दिन हालत बिगड़ जाने पर उन्हें एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था जहां सोमवार को सुबह करीब चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।
शाम चार बजे सिटी श्मशान भूमि पर शहर के तमाम गणमान्य लोगों और दिल्ली, लखनऊ, नैनीताल, देहरादून आदि शहरों से पहुंचे उनके प्रशंसकों के बीच उनके छोटे बेटे प्रफुल्ल ने उन्हें मुखाग्नि दी।
हिंदी कविता के आधुनिक कवियों में शुमार और साहित्य जगत में ‘वीरेन दा’ के नाम से पहचाने जाने वाले वीरेन डंगवाल को सन् 2007 की शुरुआत में पहली बार गले का कैंसर हुआ था।
अद्भुत जीवट के शख्स वीरेन डंगवाल उसे मात देकर कुछ ही समय बाद फिर साहित्य और पत्रकारिता जगत में लौट आए थे। इस बीच दिल्ली के रॉकलैंड अस्पताल में इलाज के दौरान भी उन्होंने ‘रॉकलैंड डायरी’ के नाम से कई कविताएं लिखीं। 2012 की शुरुआत में ही दोबारा कैंसर उभर आने पर उन्हें इलाज के लिए दोबारा दिल्ली जाना पड़ा, जहां से पिछले रविवार को ही वह बरेली लौटे थे।
पांच अगस्त 1947 को कीर्तिनगर, टिहरी गढ़वाल (उत्तराखंड) में जन्मे वीरेन डंगवाल ने मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, कानपुर, बरेली, नैनीताल और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही हिंदी में एमए और डी फिल करने वाले वीरेन डंगवाल 1971 में बरेली कॉलेज बरेली से जुड़े और हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष रहे।
जार्ज फर्नांडीज की पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’ से लेखन शुरू करने के बाद 1978 में इलाहाबाद से निकलने वाले अखबार ‘अमृत प्रभात’ में ‘घूमना आइना’ शीर्षक से स्तंभ लेखन शुरू किया। यह स्तंभ काफी मशहूर हुआ। वह इस बीच पीटीआई, टाइम्स ऑफ इंडिया और पायनियर में भी लिखते रहे।
वीरेन डंगवाल का पहला कविता संग्रह 43 साल की उम्र में ‘इसी दुनिया में’ आया जिसकी कविता ‘राम सिंह, हवा, समोसा, इतने भला न बन जाना’ काफी चर्चित रही। इस संकलन को 1992 में रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार और 1993 में श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार से नवाजा गया।
दूसरा संकलन ‘दुष्चक्र में सृष्टा’ सन् 2002 में आया। इस संकलन की कविता ‘हमारा समाज’, ‘आएंगे उजले दिन जरूर आएंगे’ और ‘दुष्चक्र में सृष्टा’ खास मानी गईं। इसी साल उन्हें ‘शमशेर सम्मान’ भी दिया गया। तीसरा संग्रह ‘स्याही ताल’ आया जिसमें ‘कानपुर’, ‘कटरी की रुक्मनी’, ‘ऊधौ मोहि ब्रज बिसरत नाहीं’ आदि चर्चित कविताएं शामिल हैं और तमाम आंदोलनों में अब भी गाई जाती हैं।
2004 का साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया
कविता संग्रह ‘दुष्चक्र में सृष्टा’ के लिए उन्हें 2004 का साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। उनकी कविताएं मराठी, पंजाबी, अंग्रेजी, मलयालम और उड़िया में भी छपीं। विश्व कविता में उन्होंने पाब्लो नेरूदा, बर्टोल्ट ब्रेख्त, वास्को पोपा, मीरोस्लाव, होलुब, तदेऊश रोजेविच और नाज़िम हिकमत के अपनी विशिष्ट शैली में दुर्लभ अनुवाद भी किए। अंतिम समय में वीरेन डंगवाल की पत्नी रीटा डंगवाल और दोनों बेटे प्रशांत डंगवाल और प्रफुल्ल डंगवाल हर पल उनके साथ रहे।
अमर उजाला समाचार पत्र समूह के प्रबंध निदेशक राजुल माहेश्वरी, प्रदेश के लघु उद्योग राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) भगवत सरन गंगवार, महापौर डा. आईएस तोमर, विधायक डा. अरुण कुमार, विधायक वीरेंद्र सिंह, खानकाह नियाजिया के प्रबंधक शब्बू मियां, बरेली कालेज के प्राचार्य डा. आरबी सिंह, दैनिक जागरण के सीजीएम एएन सिंह, शहर प्रमुख उद्यमी, राजनेता और व्यापारियों के साथ पत्रकार समुदाय के तमाम लोगों ने उन्हें सिटी श्मशान भूमि पहुंचकर अंतिम विदाई दी।
आहत कर गया डंगवाल का जाना, सभी ने सहेजीं स्मृतियां
हिन्दी कविता के सशक्त हस्ताक्षर वीरेन डंगवाल का जाना हिन्दी जगत के साथ ही संगमनगरी के रचनाकारों को भी आहत कर गया है। दरअसल इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही एमए और डीफिल के साथ ही उनके लिए कविता के संस्कार और सरोकारों से जुड़ाव की पाठशाला भी इलाहाबाद ही रहा है। इलाहाबाद आने का कोई भी मौका उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। यहां आने पर गुरुओं और रचनाकार मित्रों के अतिरिक्त छात्रों, करीबियों से भी खुलकर बोले-बतियाए। उनकी सहजता ही उनका बड़प्पन था।
वरिष्ठ कवि हरीशचंद्र पांडेय ने कहा, वह मेरे बड़े भाई जैसे थे, उनका जाना भीतर तक आहत कर गया है। उन्होंने हिन्दी कविता को संभ्रांतता से बाहर निकाला और सामान्यता को उसके विरुद्ध खड़ा किया। उनका व्यक्तित्व ऊष्मा से भरा हुआ था। बनावटीपन से दूर वह भाषा और व्यवहार, दोनों में निश्छल थे।
उनका जाना परिवार के किसी बड़े के जाने जैसा
सुपरिचित कवि यश मालवीय ने स्मृतियां सहेजीं। कहा, उनका जाना परिवार के किसी बड़े के जाने जैसा है। वह मेरे ससुर रामजी पांडेय के अभिन्न मित्र और पारिवारिक सदस्य थे। रामजी पांडेय के साथ वह भी आरती के विवाह का प्रस्ताव लेकर मेरे घर आए थे। शिक्षक, कवि, रचनाकार, पत्रकार, संपादक सहित उनके व्यक्तित्व के कई आयाम थे।
यहीं नीलाभ प्रकाशन से उनका पहला काव्य संग्रह छपा। उनकी कविताओं में अमरूदों सहित कंपनी बाग, सिविल लाइंस आदि शिद्दत से शामिल है। विधा के विभाजन से दूर वह अद्भुत जिजीविषा के व्यक्ति थे।
वरिष्ठ कवि अजामिल ने कहा, वीरेन जी ने कविता को नया प्रतिमान दिया, नई भाषा, नए प्रयोग, नए मुहावरे दिए। उनका जाना हिन्दी कविता का बड़ा नुकसान है।
वरिष्ठ कवि नंदल हितैषी ने कहा, वीरेन जी अपने समकालीन सहित नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक की भूमिका में रहे। साहित्यकार डॉ.देवी प्रसाद कुंवर ने कहा, हिन्दी कविता को समृद्ध करने में उनका योगदान अविस्मरणीय है। एकेडेमी के कोषाध्यक्ष और कवि रविनंदन सिंह ने कहा, वीरेनजी ने कविता को नई भाषा, मुहावरों से समृद्ध करते हुए आमजन के करीब ला खड़ा किया।
वीरेन ने किया कविता के संजाल-जंजाल को ध्वस्त
दूधनाथ सिंह, भारत भारती से सम्मानित साहित्यकार ने याद करते हुए बताया कि वीरेन डंगवाल ने सन 1965 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एमए करने के बाद अज्ञेय की कविताओं पर प्रोफेसर रामस्वरूप चतुर्वेदी के निर्देशन में डीफिल किया।
वह एक खिलंदड़ किंतु सरल, सौम्य व्यक्ति थे। वह अपने मित्रों, गुरुओं के अलावा सामान्य जन की चिंता भी समभाव से ही करते थे। वीरेन हिन्दी के उन कवियों में हैं, जिन्होंने अपने शिल्प और भाषिक संरचना से अपने समय की कविता के संजाल और जंजाल को ध्वस्त किया।
एक नई भाषा, नए तेवर और नए विषयों को लेकर वीरेन ने अपने समय के कवियों से अलग, बिल्कुल ताजी और अनहोनी कविताएं लिखीं। वह अपने समय का लगभग सबसे बड़ा कवि था। उसने पुराने छंदों को भी कविता में प्रयुक्त करने सहित जिन विषयों और जिस छंद व्यवस्था को नई कविता में छोड़ दिया गया था, उन सबको लेकर चुनौतीपूर्ण ढंग से कविताएं लिखीं।
निराला के ‘राम की शक्तिपूजा’ के छंद का प्रयोग इसका उदाहरण है। कम लिखते हुए भी उसके जाने से हिन्दी कविता का एक सुनहरा व्यक्तित्व परदे से गायब हो गया।
विवि हिन्दी विभाग की ओर से भी शोक प्रस्ताव पारित
जाने-माने कवि वीरेन डंगवाल के निधन पर अनेक साहित्यिक संस्थाओं ने दुख जताया है। जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रोफेसर राजेंद्र कुमार ने प्रलेस, जलेस, जसम की ओर से जारी प्रस्ताव में कहा कि जसम के उपाध्यक्ष वीरेन जी के निधन से साहित्य के क्षेत्र में अपूरणीय क्षति हुई है। उनका इलाहाबाद से आत्मीय नाता रहा। बीमारी के बावजूद उनकी जिजीविषा अद्भुत थी। उनके व्यक्तित्व का खुलापन सभी को प्रभावित करता था।
वहीं इलाहाबाद विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग में आयोजित शोक सभा में दूधनाथ सिंह ने उन्हें सच्चे अर्थों में कवि रचनाकार बताया। कहा, वह अच्छे इंसान और दोस्त थे। हिन्दी विभाग को उन पर गर्व है। वह सर गंगानाथ झा छात्रावास के अंत:वासी थे। उन पर चर्चा के लिए विभाग में विस्तृत गोष्ठी होनी चाहिए। डॉ.सूर्यनारायण ने शोक प्रस्ताव पढ़ा। इससे पहले दो मिनट का मौन रखा गया। सभा में प्रोफेसर रामकिशोर, प्रोफेसर मुश्ताक अली, डॉ.कृपा शंकर पांडेय, भूरेलाल के अतिरिक्त शोधार्थियों, विद्यार्थियों ने मौजूदगी दर्ज कराई।
वीरेनजी ने कहा था, इंशाअल्ला जरूर आऊंगा
वीरेन जी का इलाहाबाद से करीबी नाता रहा। यहां के हर न्योते को उन्होंने पूरे मन से स्वीकारा और उसे पूरा भी किया। बस, उनकी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में रचनापाठ की आस अधूरी रह गई। ‘अमर उजाला’ से बातचीत में डॉ.सूर्यनारायण ने याद दिलाया, वीरेन जी ने सहजता से कहा था, इंशाअल्ला अपने विभाग में भी रचनापाठ के लिए आऊंगा लेकिन अब यह आस अधूरी रह गई।
वैसे तो उनका इलाहाबाद आना जाना लगा ही रहा लेकिन अंतिम बार बीमारी की हालत में भी वह जन संस्कृति मंच की राष्ट्रीय परिषद के एजेंडे सहित अन्य मुद्दों पर चर्चा के लिए वर्ष 2012 में एलआईसी गेस्ट हाउस में आए थे। साहित्य अकादमी से पुरस्कृत होने के बाद, परिवेश और विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की ओर से वर्ष 2004 में सीनेट हाल में उन्हें सम्मानित किया गया था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ भवन में हुए कवि सम्मेलन सहित सत्यप्रकाश मिश्र के न्योते पर इलाहाबाद संग्रहालय में कविता पर तीन दिनी समारोह और हिन्दी साहित्य सम्मेलन के कविता समारोह में भी शामिल हुए थे।
अमेरिका की ओर से इराक पर हमले के खिलाफ जन संस्कृति मंच की ओर से निराला सभागार में हुए ‘युद्ध के विरुद्ध’ कविता समारोह में भी वह शामिल हुए। सांस्कृतिक केंद्र की ओर से उत्तराखंड पर्व के तहत हुए कवि सम्मेलन में उनकी मौजूदगी अहम रही। इससे पहले विवेक निराला के पहले काव्य संग्रह के लोकार्पण और परिचर्चा में भी नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह, मैनेजर पांडेय, परमानंद श्रीवास्तव संग वह भी शामिल हुए।