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'बलात्कारियों को फांसी नहीं, ताउम्र जेल की सजा मिले'

Wed, 23 Jan 2013 10:49 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
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महिलाओं पर होने वाले अपराधों को रोकने के लिए कानून में संशोधन की सिफारिश के लिए बनाई गई जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी ने सरकार को बुधवार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी।
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कमेटी ने बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा पर असहमति जताते हुए बलात्कार और गैंग रेप के दोषियों को ताउम्र सलाखों के पीछे रखे जाने की सिफारिश की। कमेटी के मुताबिक पत्नी से जबरदस्ती और बिना सहमति के समलैंगिक संबंध को भी बलात्कार की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। हालांकि कमेटी नाबालिग की उम्र 18 साल से घटाकर 16 साल करने के पक्ष में नहीं है।

कमेटी ने सरकारी तंत्र की उदासीनता को महिलाओं के खिलाफ अत्याचार का मुख्य कारण बताते हुए पुलिस के कामकाज, न्यायपालिका के तौर तरीके, चुनाव प्रक्रिया और महिलाओं के साथ होने वाले दुष्कर्म की कानूनी परिभाषा में आमूलचूल बदलाव की सिफारिश की है।
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कमेटी ने कहा है कि हमारे वर्तमान कानून में कोई कमी नहीं है। वह महिलाओं के खिलाफ जुर्म से निबटने में सक्षम है बशर्ते सरकारी तंत्र अपनी मानसिकता में बदलाव लाकर उसका पालन कारगर तरीके से करे।

गृहमंत्रालय के संयुक्त सचिव स्तर के दो अधिकारियों को रिपोर्ट सौंपने के बाद बुलाई गई प्रेस कांफ्रेंस में जस्टिस वर्मा ने सरकार और पूरे तंत्र की उदासीनता पर हैरानी जताते हुए कहा कि समाज में महिलाओं को समान अधिकार दिए बिना इस समस्या से नहीं निबटा जा सकता।

कमेटी ने इस रिपोर्ट को दरिंदगी की शिकार युवती के नाम समर्पित करते हुए कहा है कि सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि बजट सत्र के पहले रिपोर्ट की सिफारिशों पर ठोस फैसला ले। जस्टिस वर्मा ने इस घटना के बाद सरकार को चुनौति देने के लिए सड़कों पर उतरे नौजवानों की भुरी भुरी प्रशंसा करते हुए कहा कि अगर उन्होंने यह रूप नहीं दिखाया होता तो सरकार और सरकारी तंत्र अपने ही ढर्रे पर चल रहे होते।

कमेटी ने महिलाओं से जुड़े कानून में कई बदलवों की सिफारिश की है। साथ ही मानव तस्करी को महिला अत्याचार की शुरुआत का मुख्य कारण बताते हुए उससे जुड़े कानून को और सख्त बनाने को कहा है। कमेटी ने रिपोर्ट में महिलाओं से जुड़े कानून के  पालन में कोताही बरतने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए भी एक से दस साल की सजा का प्रावधान रखा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं में सुरक्षा की भावना पैदा करना सरकार की जिम्मेदारी है। लिहाजा अब सरकार को वे सभी कदम उठाने होंगे जिनसे महानगरों के साथ दूर दराज के इलाकों की महिलाओं की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सके। इसके लिए कानून में फेरबदल के साथ उसके कारगर अमल पर काम करना होगा।

इस तीन सदस्यीय कमेटी ने रिपोर्ट में युवतियों पर तेजाब फेंके जाने और अशांत क्षेत्र में तैनात फौज और अर्धसैनिक बलों से जुड़े मामलों पर भी बदलाव की कई सिफारिशें की हैं।

कमेटी ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राज्यों में सैन्य बल विशेषाधिकार कानून (अफ्सपा) में बदलाव लाकर बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के आरोपी अधिकारियों के मामले कोर्ट मार्शल के बजाए सिविल अदालतों में सामान्य कानून के तहत निबटाए जाने चाहिए। साथ ही तेजाब फेंकने को जघन्य अपराध बताते हुए इसके खिलाफ कड़े कानून बनाने की सिफारिश की गई है।

बलात्कारियों को नपुंसक बनाने के पक्ष में नहीं कमेटी
कमेटी ने बलात्कारियों को सजा के तौर पर रासायनिक इंजेक्शन देकर नपुंसक बनाने के सुझावों को खारिज कर दिया है। उसका कहना है कि यह एक तो मानवाधिकारों के खिलाफ है और दूसरे हमारा संविधान किसी व्यक्ति को पंगु बनाने की इजाजत नहीं देता।

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि किसी का वंध्याकरण करना असंवैधानिक और अमानवीय है। ऐसे में हम यौन अपराधियों के विरुद्ध इस सुझाव की सिफारिश नहीं कर रहे हैं। जबर्दस्ती रासायनिक ढंग से वंध्याकरण के दुष्प्रभाव होते हैं और यही कारण है कि सरकार ने रासायनिक उपायों को अपनी परिवार नियोजन की योजनाओं से अलग रखा है।

कमेटी ने रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि रासायनिक वंध्याकरण बलात्कार को खत्म करने का उपाय भी नहीं है। बलात्कार शक्ति के दुरुपयोग और यौन व्यवहार की विकृति है। इसलिए हमने इस सुझाव को खारिज कर दिया है।

गृह सचिव की खिंचाई
प्रेस कॉन्फ्रेंस में जस्टिस वर्मा ने दिल्ली गैंग रेप की घटना के बाद गृह सचिव आरके सिंह द्वारा दिल्ली पुलिस आयुक्त नीरज कुमार का बचाव करने पर उनकी खिंचाई की। सिंह ने कहा था कि उन्हें आश्चर्य है कि लोग पुलिस आयुक्त से माफी की मांग कर रहे हैं। वर्मा ने कहा, ‘आश्चर्य है कि गृह सचिव पुलिस कमिश्नर का बचाव कर रहे थे। जबकि उन्हें चाहिए था लोगों को सुरक्षा देने की ड्यूटी में नाकाम रही पुलिस से माफी मांगने को कहते।’

सिफारिशों को प्राथमिकता: कानून मंत्री
सरकार जस्टिस वर्मा समिति की सिफारिशों को प्राथमिकता से लागू करने का प्रयास करेगी। न्याय की राह में होने वाले हर तरह के विलंब को खत्म किया जाएगा। सिफारिशों को पहले कैबिनेट के सामने और फिर संवैधानिक संशोधनों के लिए संसद में रखा जाएगा।- अश्विनी कुमार, कानून मंत्री

जस्टिस वर्मा समिति की रिपोर्ट: प्रमुख सिफारिशें
- रेप और हत्या के मामले में अपराधी को 20 साल कैद की सजा दी जाए जबकि गैंगरेप के दोषियों को आजीवन जेल।
- महिला को निर्वस्त्र करना, निहारना/घूरना, पीछा करना भी अपराध की श्रेणी में रखा जाए।
- जिन सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं वे संसद के सम्मान को बरकरार रखने के लिए स्वेच्छा से पद त्याग दें।
- शिक्षा और महिलाओं/बच्चों के खिलाफ अन्याय को रोकने के लिए कैग की तरह एक नई संवैधानिक संस्था का गठन हो, जो इनसे जुड़े कानूनों की समीक्षा करे।
- पुलिस सुधारों को तत्काल लागू किया जाए और पुलिस बलों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाएं।
- किशोरों के सुधार गृहों को जुवेनाइल जस्टिस (जेजे) एक्ट के अनुसार चलाया जाए। एक्ट के जो काम राज्य सरकारें देखती हैं उन्हें न्याय व्यवस्था देखे।
- जो अधिकारी रेप के मामले को दर्ज न करे या न्याय दिलाने में देरी करे उसे सजा दी जाए।
- हर विवाह का पंजीयन हो। मजिस्ट्रेट सुनिश्चित करे कि दहेज का लेन-देन न हुआ हो।
- न्याय की गुणवत्ता से समझौता किए बगैर न्याधीशों की संख्या बढ़ाई जाए।
- सरकार तय करे कि कानून और उसका पालन कराने वाली एजेंसियां राजनेताओं के हाथों का खिलौना न बन जाएं।
- प्रशासन के प्रत्येक स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही तय की जाए।
- सशस्त्र बलों द्वारा महिलाओं के खिलाफ अत्याचार सामान्य कानून के अंतर्गत लाए जाएं। सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) को बनाए रखने पर पुनर्विचार हो।
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- कश्मीर, छत्तीसगढ़ और मणिपुर जैसे हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष आयोग बनें।

- 80,000 सुझाव मिले जस्टिस वर्मा समिति को।
- 630 पेज की रिपोर्ट समिति ने सौंपी सरकार को।
- 29 दिनों में समिति ने तैयार की रिपोर्ट।
- 23 दिसंबर को समिति ने शुरू किया था काम।
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