वाराणसी की फिजा और हवा में इन दिनों सियासत का रंग कुछ ऐसा घुला है कि सांस भी लो तो एक-आध राजनीतिक नारा भीतर चला ही जाता है। बनारस के बाशिंदों का कहना है कि काशी में इतना बड़ा मौका 2500 साल पहले आया था, जब सनातन धर्म की नींव रखी गई।
और अरसा गुजरने के बाद बनारस एक बार फिर चर्चाओं और सुर्खियों के ठीक मध्य में आ खड़ा हुआ है। मोदी बनाम केजरीवाल बनाम अजय राय की लड़ाई की जमीन बना यह शहर जैसे अचानक अपनी सुस्ती तोड़कर सियासी हो गया।
बच्चों के इम्तहान, दुकानदारों का काम-धंधा और अस्सी घाट पर हर शाम होने वाली चर्चा, सब जैसे बेमानी हो गए हैं और सिर्फ चुनावों की अहमियत बची है। इस बीच हर दल ने अपनी मजबूती और ताकत दिखाने के लिए बनारस को चार रोड शो का तोहफा दिया, जिससे शहर कुछ दुविधा में भी है।
मोदी-केजरीवाल ने सीट को बनाया हाई-प्रोफाइल
भाजपा की तरफ से पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने जब बनारस से लड़ने का ऐलान किया था, तभी यह तय हो गया था कि इस बार लोकसभा चुनावों की 542 सीटों के मुकाबले यह एक सीट ज्यादा भारी पड़ेगी। और ऐसा हुआ भी।
लेकिन इस बात की कल्पना किसी ने नहीं की थी कि मोदी से अलहदा दूसरे राजनीतिक दल भी इस सीट को लेकर उनकी राह खाली नहीं छोड़ेंगे। पहला ऐलान केजरीवाल की तरफ से आया।
आम आदमी पार्टी के नेता ने तय किया कि वो मोदी के खिलाफ लड़ेंगे और इसे जनता का फैसला बताया। दिल्ली विधानसभा चुनावों के बाद देश की राजनीति में अपनी जगह टटोलने की कोशिश कर रही पार्टी ने जानबूझकर यह सीट चुनी।
फिर शुरू हुआ शक्ति-प्रदर्शन का दौर
इसके बाद कांग्रेस की तरफ से कई नाम उछाले गए। केंद्रीय राजनीति में दखल रखने वाले दिग्विजय सिंह और आनंद शर्मा से लेकर पार्टी का सबसे ज्यादा चमकते चेहरे प्रियंका गांधी का नाम भी सामने आया।
लेकिन अंत में सारी हवा फुस्स। मोदी के खिलाफ बनारस में अजय राय को चुना गया, जो स्थानीय हैं। राजनीतिक विश्लेषकों ने उन्हें कमजोर दावेदार बताया, लेकिन दबंग मुख्तार अंसारी का समर्थन हासिल कर उन्होंने मामला कुछ दिलचस्प बना दिया।
इसके बाद शुरू हुआ रोड शो का दौर, जो इससे पहले बनारस ने इस तरह कभी नहीं देखा था। इसकी शुरुआत भाजपा के पीएम पद के दावेदार ने की और इसका अंत किया सूबे के सीएम अखिलेश यादव ने।
मोदी ने पर्चा भरा और ताकत दिखाई
नरेंद्र मोदी ने जिस दिन बनारस से पर्चा भरने का फैसला किया, भाजपा ने उसी दिन अपना शक्ति प्रदर्शन कर दिया। बीएचयू से कचहरी तक मोदी ने रोड शो किया।
इस रोड शो को लेकर भाजपा ने अपनी सारी ताकत झोंक दी। उस रोज बनारस की गलियों में सिर्फ भगवा रंग दिखा। लेकिन मोदी सिर्फ इस रोड शो तक ही सीमित नहीं रहे।
एक रोड शो उन्होंने ऐसा भी किया, जिसे औपचारिक रूप से यह नाम नहीं दिया गया था। बेनियाबाग रैली की इजाजत न मिलने के बाद भाजपा ने 8 मई का दिन विरोध-प्रदर्शन से शुरू किया और बनारस की रात खत्म हुई, तो मोदी के अनाम रोड शो के साथ।
फिर केजरीवाल ने दिया मोदी को जवाब
इस कार्यक्रम के लिए किसी तरह की औपचारिक मंजूरी नहीं ली गई थी और न पार्टी ने इसे रोड शो कहा। लेकिन हेलीकॉप्टर से बीएचयू कैंपस में उतरे मोदी जब भाजपा कार्यालय तक पहुंचे, तो समर्थकों और कार्यकर्ताओं की भीड़ ने इसे रोड शो ही बना दिया।
ठीक अगले दिन आम आदमी पार्टी ने भाजपा को करारा जवाब दिया। अरविंद केजरीवाल ने 9 मई की शाम बनारस में रोड शो कर अपनी ताकत का अहसास कराया और यह बता दिया कि उनके विरोधी अगर उन्हें हल्के में ले रहे हैं, तो दोबारा सोचने की जरूरत है।
इस रोड शो में केजरीवाल के साथ आम आदमी पार्टी के सभी शीर्ष नेता शामिल थे और कार्यकर्ताओं ने इसके पीछे अपनी सारी ताकत झोंक दी। हालांकि, उनकी राह आसान नहीं। केजरीवाल खुद कह चुके हैं कि दिल्ली की तुलना में बनारस जितना कहीं ज्यादा मुश्किल है।
राहुल के रोड शो की भीड़ ने दोनों को चौंकाया
आम आदमी पार्टी के रोड शो तक बनारस में केवल नरेंद्र मोदी बनाम केजरीवाल के बीच लड़ाई के संकेत दिख रहे थे, लेकिन प्रचार के आखिरी दिन कांग्रेस ने उन दोनों को चौंका दिया।
अपने गढ़ अमेठी में नरेंद्र मोदी की रैली से खफा कांग्रेसियों ने जोरदार पलटवार किया और पार्टी की कमान संभालने वाले राहुल गांधी ने बनारस में अपना रोड शो कर यह जता दिया कि अजय राय को चूका हुआ नहीं माना जा सकता। संकेतों की राजनीति भी जारी रही।
जहां से भाजपा ने अपना रोड शो शुरू किया था, उसी लंका गेट पर राहुल ने अपना रोड शो खत्म किया। तीन रोड शो में बनारस ने पहला भगवा, फिर सफेद और उसके बाद तिरंगी टोपियों की भीड़ देखी। लेकिन शो अभी बाकी था।
अखिलेश यादव भी नहीं रहे पीछे
मोदी बनाम केजरीवाल बनाम अजय की इस जंग में कूदकर समाजवादी पार्टी ने भी साफ कर दिया कि उसे भले लड़ाई में मजबूत न माना जा रहा हो, लेकिन वो अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती।
दस मई की दोपहर जैसे ही राहुल गांधी का रोड शो खत्म हुआ, समाजवादी पार्टी के नेता और सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का शक्ति-प्रदर्शन शुरू हुआ। इस बार बनारस की गलियों में लाल टोपी छा गई।
सपा के लिए बनारस इसलिए भी अहम है, क्योंकि उसके करीब आजमगढ़ से उसके बॉस मुलायम सिंह यादव चुनाव लड़ रहे हैं। यह फैसला पूर्वांचल में मोदी के असर को कम करने के लिए उठाया गया था।
समर्थकों की भीड़ जिताएगी बनारस?
इन तमाम रोड शो में भीड़ तो खूब दिखी, लेकिन इस सवाल का जवाब नहीं मिला कि बनारस में आखिर जीतेगा कौन? दरअसल, भाजपा हो या आम आदमी पार्टी, कांग्रेस हो या समाजवादी पार्टी, सभी के रोड शो में हजारों की भीड़ दिखी।
बनारस में तैनात टीवी चैनलों के संवाददाता और कैमरा ताने खड़े कैमरामैन से जब पूछा गया कि किसके रोड शो में ज्यादा भीड़ दिखी, तो उनके पास सिर खुजाने के अलावा दूसरा चारा नहीं था।
दरअसल, जिस भी पार्टी ने यहां रोड शो किया, उसने बनारस के जरिए देश भर में यह संदेश देने की कोशिश की कि मौजूदा चुनावों में बाजी किसी और के हाथ में नहीं, बल्कि उसके पास है।
बनारस के बाशिंदे बताएंगे किंग कौन
कार्यकर्ताओं के हुजूम में यह सवाल कहीं गुम गया कि किस पार्टी के रोड शो में बनारस के स्थानीय लोगों ने हिस्सा लिया या वो किसे चुनने जा रहे हैं। जाहिर है, रैलियों की तरह रोड शो के लिए भी सभी पार्टियों ने खूब पैसा और साधन खर्च किए।
और फिर अपनी भीड़ को स्थानीय और दूसरे की भीड़ को बाहर से जुटाए गए लोग बताया जाना पुरानी रवायत तो है ही। बनारस इन दिनों खूब परेशान है। स्थानीय जनता भीड़ से आजिज आ चुकी है और शिद्दत से 12 मई का इंतजार कर रही है।
यह वही दिन है, जब रोड शो को दूर से देखने वाला बनारस बता देगा कि सड़कों पर जुटाई जाने वाली हजारों कार्यकर्ताओं की भीड़ अलग है और वोट देने को लेकर उसका मूड अलग!