केंद्र सरकार की ओर से कुदरत के कहर को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने का कोई प्रावधान नहीं है।
यही वजह है कि सरकार ने उत्तराखंड की तबाही को राष्ट्रीय आपदा घोषित नहीं कर उसे गंभीर व भीषण संकट यानी कलैमिटी ऑफ सीरियस नेचर (सीएसएन) माना है।
सरकार के मुताबिक उत्तराखंड की तबाही को सीएसएन घोषित करने से केंद्र और राज्य के साथ मिलकर तत्काल और दूरगामी योजनाओं पर काम करने के कई तकनीकी रास्ते खुल जाते हैं। साथ ही इस त्रासदी से उबरने में सांसद निधि के फंड का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
सरकार ने उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा को कलैमिटी ऑफ सीरियस नेचर करार देने की जानकारी संसद के दोनों सदनों के सचिवालयों को भी भेज दी है, ताकि सांसद अपनी सांसद निधि से भी मदद कर सकें।
सांसद निधि के नियमों के मुताबिक सरकार की इस घोषणा से देश भर के सांसद अपने इलाके के लिए खर्च किए जाने वाले 50 लाख के फंड को उत्तराखंड के लिए दे सकते हैं।
सरकार को उम्मीद है कि इससे प्रधानमंत्री की ओर से 1000 करोड़ रुपये के राहत पैकेज के अलावा सांसदों की ओर से भारी रकम सहायता के तौर पर मिलेगी।
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गृहमंत्रालय के आपदा प्रबंधन के उच्च अधिकारी के मुताबिक इस तबाही को तकनीकी तौर पर राष्ट्रीय आपदा नहीं कहा जा सकता क्योंकि सरकार के शब्दकोश में कुदरत के कहर के लिए राष्ट्रीय आपदा जैसा शब्द है ही नहीं।
अधिकारी के मुताबिक संघीय ढांचे में राहत व बचाव का असल दायित्व तो राज्य का है लेकिन उत्तराखंड जैसी आपात स्थिति में केंद्र के बिना यह संभव नहीं। यही वजह है कि इसे सीएसएन घोषित किया गया ताकि तकनीकी तौर पर केंद्र के मदद से रास्ते खुल जाएं।
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हालांकि खाद्य व नागरिक आपूर्ति और स्वास्थ्य जैसे मंत्रालयों के लिए इसे सीएसएन जैसे प्रावधानों की भी जरूरत नहीं। ये मंत्रालय अपने बूते ही राहत और बचाव के लिए पहल कर सकते हैं।
अधिकारी के मुताबिक गृहमंत्रालय और वित्त मंत्रालय ने सुनामी और लेह के बादल फटने जैसी तबाही के बाद उठाए गए कदमों की तर्ज पर उत्तराखंड में भी अंतर मंत्रालयी समूह भेजने की हरी झंडी दे दी है।
वहां की स्थिति में थोड़ी सुधार आते ही यह समूह प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करेगी। यह समूह उत्तराखंड को इस तबाही से उबारने के लिए दूरगामी उपायों पर अपनी रिपोर्ट देगी। जहां तक तत्काल उपायों का सवाल है उसके लिए केंद्र हर उपाय कर रहा है।