कांग्रेस ने राहुल गांधी तो भाजपा ने राजनाथ सिंह के हाथ 2014 के लोकसभा चुनाव की कमान सौंप कर उत्तर प्रदेश को एक बार फिर केंद्र की सत्ता-सियासत की धुरी बना दिया है।
गठबंधन की राजनीति के इस दौर में केंद्र की सत्ता की दोनों प्रमुख दावेदार पार्टियों कांग्रेस और भाजपा का पहला लक्ष्य चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना होगा। यूपी की 80 लोकसभा सीटें राजनीतिक तराजू को एक ओर झुकाने की क्षमता रखती हैं। यूपी में कांग्रेस और भाजपा दोनों की हालत लगभग एक जैसी है। ऐसे में दोनों पार्टियों ने उत्तर प्रदेश से जुड़े नेता को कमान थमा कर 2014 की तस्वीर बदलने की कोशिश शुरू कर दी है।
राहुल को 2014 के चुनाव की कमान के साथ प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी पर लगभग तस्वीर साफ कर चुकी कांग्रेस यूपी में 1989 से पहले के दौर के लौटने की उम्मीद कर रही है, क्योंकि कांग्रेस को भरोसा है कि राहुल के सहारे ब्राह्मणों के साथ उच्चवर्ग के वोट बैंक भी उसके पाले में आ सकते हैं।
साथ ही केंद्र की ओर नरेंद्र मोदी के बढ़ते कदम को रोकने के लिए अल्पसंख्यक वर्ग भी कांग्रेस का दामन थाम सकता है। वैसे अचानक भाजपा की कमान यूपी से जुड़े राजनाथ सिंह के हाथ आ जाने से कांग्रेस की उम्मीदों को झटका लगा है।
बहरहाल राहुल गांधी और राजनाथ सिंह दोनों के लिए यूपी में अगला लोकसभा चुनाव लिटमस टेस्ट साबित होगा। दोनों पार्टियों की यूपी में मौजूदा स्थिति में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। सिवाय इस बात के कि लोकसभा में कांग्रेस के भाजपा के 10 के मुकाबले 22 सांसद हैं तो विधानसभा में कांग्रेस के 28 के मुकाबले भाजपा के 50 विधायक हैं।
राहुल गांधी के कमान संभालने के बाद कांग्रेस जाहिर तौर पर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कहीं न कहीं यूपी के वोटरों को उनकी प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी का आइना दिखाकर बढ़त बनाने की सियासत करेगी। आखिर देश को तमाम प्रधानमंत्री देनेवाले यूपी पिछले दो आम चुनाव से इस तमगे से वंचित है।
कांग्रेस के इस दांव का जवाब देना जरूर राजनाथ सिंह के लिए थोड़ा कठिन होगा, क्योंकि अध्यक्ष पद के झगड़े से उबरी भाजपा चुनाव से पहले पीएम पद का उम्मीदवार शायद ही घोषित करे। मगर एक बात तो तय है कि कांग्रेस में राहुल और भाजपा में राजनाथ के कमान थामने से समाजवादी पार्टी और बसपा की चुनौती भी बढ़ गई है।