गुंजा ने आरोप लगाया है कि उन्हें दहेज के कारण शौचालय में बंद रखा जाता था। गुंजा के पिता श्याम सुंदर सिंह की शिकायत के बाद पुलिस ने सात सितंबर को उन्हें ससुराल से मुक्त कराया।
फ़िलहाल गुंजा मधुबनी ज़िले के पसटन गांव स्थित अपने मायके में हैं. लेकिन गुंजा के पति के वकील ने इन आरोपों को ग़लत क़रार दिया है। बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए स्थानीय पत्रकार मनीष शांडिल्य ने पसटन में उनसे मुलाक़ात की।
गुंजा की आपबीती, उन्हीं की ज़ुबानी
जून, 2010 में दरभंगा के प्रभात प्रसाद सिंह के साथ मेरी शादी हुई। लगभग एक साल तक संबंध मधुर रहे। लेकिन 2011 के अप्रैल में बेटी को जन्म देते ही रिश्ता बिगड़ने लगा। नतिनी को देखने आए मेरे माता-पिता को मुझसे मिलने तक नहीं दिया गया।
मेरी सास मुझे बदक़िस्मत कहने लगी। मैं बीमार पड़ी तो मुझे मेरी बेटी के बिना ही मायके भेज दिया गया। लगभग चार महीने बाद ससुराल वापस लौटी तो और दहेज मांगा जाने लगा। और ऐसा नहीं होने पर मेरी मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना का सिलसिला शुरू हुआ। मायके वाले कभी-कभार मिलने आते तो उन्हें मुझसे मिलने नहीं दिया जाता।
कुछ दिनों बाद मुझे घर के अंदर शौचालय के बग़ल में एक अंधेरे कोने में बिना बिस्तर वाली चौकी पर रहने को मजबूर कर दिया गया. मैं यहीं लगभग तीन साल तक रही।
वहां तक सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती थी और न ही बिजली को कोई बल्ब ही लगा था। मेरे बर्तन अलग कर दिए गए. मुझे वक्तत-बेवक्त जूठा और बासी खाना दिया जाने लगा। घर के काम-काज से अलग कर मेरे साथ अछूतों जैसा व्यवहार किया जाने लगा। इतना ही नहीं कोई मेहमान आता तो मुझे शौचालय में बंद कर दिया जाता।
लगभग एक साल पहले एक दिन मेरे पति ने मेरा सिंदूर धो डाला, चूड़ियां तोड़ दी और मुझे विधवा वाली सफ़ेद साड़ी पहनने के लिए मजबूर कर दिया।
इसके बाद मैं जब कभी सिंदूर लगाती तो मुझे इसके लिए भी मारा जाता। साथ ही बेटी लक्की को मुझसे दूर करने की कोशिशें की जाने लगी। वह मुझे मम्मी कहती तो उसे भी डांटा-मारा जाता।