फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जब अपनी सगाई तोड़ कैफी आजमी से शादी के लिए अड़ गई थी वो लड़की

विज्ञापन
विज्ञापन
आज मशहूर शायर और फिल्मी दुनिया के गीतकार कैफी आजमी का जन्मदिन है। कैफी के चाहने वाले उन्हें रूमानियत का शायर कहते थे ऐसे अनेक किस्से हैं जब उन्हें सुनने वाले पहली बार में ही उन्हें अपना दिल दे बैठते थे। ऐसा ही एक किस्सा उनके बारे में उनके समकालीन शायर निदा फाजली ने साझा किया था।
विज्ञापन


बकौल निदा फाजली, ''कैफी आज़मी सिर्फ शायर ही नहीं थे। वह शायर के साथ स्टेज के अच्छे ‘परफार्मर’ भी थे। इस ‘परफार्मेंस’ की ताकत उनकी आवाज़ और आवाज के उतार चढ़ाव के साथ मर्दाना कदोकामत और फिल्मी अदाकारों जैसी सूरत भी थी।

शायरी और इसकी अदायगी। ये दोनों विशेषताएं किसी एक शायर में मुश्किल से ही मिलती है। और जब ये मिलती है तो शायर अपने जीवन काल में ही लोकप्रियता के शिखर को छूने लगता है। कैफी आजमी इसी परंपरा से जुड़े शायर थे, यह परंपरा उन्हें बचपन में मोहर्रम की उन मजलिसों से मिली थी, जिनमें मर्सिए (शोक-गीत) सुनाए जाते थे।
विज्ञापन


सुनाने वाले आंखों और हाथों के हाव-भाव और आवाज़ के उतार-चढ़ाव से सुनने वालों को जब चाहे हंसाते थे, जब चाहे रुलाते थे और कभी उनसे मातम करवाते थे। कैफी आजमी का पढ़ने का अंदाज़ अपने-अपने समकालीनों में सबसे अनोखा था। मैंने हिंदी के सुमन और भवानी भाई को भी सुना है और उर्दू के फ़िराक़ और जोश को भी।

ये सारे अपने अपने अंदाज़ में महफिलों में छा जाते थे लेकिन कैफी आजमी जब कलाम पढ़ने के लिए बुलाए जाते तो पढ़ने के बाद पूरे मुशायरे को अपने साथ ले जाते थे।

हैदराबाद में कलाम सुनते सुनते फिदा हुई लड़की

हैदराबाद में एक मुशायरे में उनकी इसी कलात्मक प्रस्तुति ने कैफी के जवानी के दिनों की एक हसीना को किसी और के साथ अपनी मंगनी तोड़ने पर मजबूर कर दिया था। कैफी अपनी मशहूर नज्म औरत सुना रहे थे...

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे
क़द्र अब तक तेरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझमें शोले भी हैं बस अश्क फिशानी ही नहीं
तू हक़ीकत भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान...

और वह लड़की अपनी सहेलियों में बैठी कह रही थी, “कैसा बदतमीज़ शायर है, वह ‘उठ’ कह रहा है। उठिए नहीं कहता और इसे तो अदब-आदाब की अलिफ़-बे ही नहीं आती। इसके साथ कौन उठकर जाने को तैयार होगा?”

मुंह बनाते हुए वह व्यंग्य से पंक्ति दोहराती है, ‘उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे..’

मगर जब श्रोताओं की तालियों के शोर के साथ नज़्म ख़त्म होती है तो वह लड़की अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फ़ैसला ले चुकी थी। मां बाप ने लाख समझाया वह नहीं मानी। सहेलियों ने इस रिश्ते की ऊँच-नीच के बारे में भी बताया। वह शायर है, शादी के लिए सिर्फ़ शायरी काफ़ी नहीं होती। शायरी के अलावा घर की ज़रूरत होती है।

सहेलियों ने डराया 'बेघर के साथ क्या रहना'

वह खु़द बेघर है, खाने-पीने और कपड़ों की भी ज़रूरत होती है। कम्युनिस्ट पार्टी उसे केवल 40 रुपए महीना देती है। लेकिन वह लड़की अपने फैसले पर अटल रही। और कुछ ही दिनों में अपने पिता को मजबूर करके बंबई ले आई।

सज्जाद ज़हीर के घर में कहानीकार इस्मत चुग़ताई, फ़िल्म निर्देशक शाहिद लतीफ़, शायर अली सरदार जाफ़री, अंग्रेज़ी के लेखक मुल्कराज आनंद की मौजूदगी में वह रिश्ता जो हैदराबाद में मुशायरे में शुरू हुआ था, पति-पत्नी के रिश्ते में बदल गया।

सरदार जाफ़री ने दुल्हन को कैफी का पहला संग्रह ‘आख़िरी शब’ तोहफ़े में दिया। इसके पहले पेज पर कैफ़ी के शब्द थे, शीन (उर्दू लिपि का अक्षर) के नाम। मैं तन्हा अपने फ़न को आखिरी शब तक ला चुका हूं तुम आ जाओ तो सहर हो जाए।

यह ‘शीन’ अब कैफी आजमी की विधवा हैं। वह शौकत ख़ान से शौकत आज़मी बनीं थीं, उनके नाम का पहला अक्षर है ‘शीन’। शौकत आज़मी जो जवानकैफी की खूबसूरत प्रेमिका थी, आज भारत की बड़ी अभिनेत्री शबाना आज़मी की मां हैं।
विज्ञापन

11 साल की उम्र में शुरू की थी शायरी

कैफी आजमी ने शायरी 11 साल की उम्र में शुरू की, उन्होंने अपनी पहली ग़ज़ल जब गांव की एक महफिल में सुनाई तो उनकी उम्र को देखते हुए किसी को यकीन नहीं आया कि यह उन्हीं की लिखी हुई है।

कैफी को इस बेयकीनी पर काफी दुख हुआ। लेकिन इस दुख ने कम उम्र कैफ़ी को तोड़ा नहीं, इसे उन्होंने अपनी ताक़त बनाया और अपनी मेहनत और रियाज़त से वह बन कर दिखाया, जिसे आज लोग कैफ़ी आज़मी के नाम से जानते हैं।

कैफी की उस पहली गजल का मतला है-

इतना तो ज़िंदगी में किसी की खलल पड़े
हंसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

11 साल की उम्र में कही गइ यह गजल बेगम अख्तर की आवाज़ में पूरे देश में मशहूर हो चुकी है। 40 रुपए मासिक पगार से शुरु करके पृथ्वी थिएटर के सामने एक आलीशान बंगले तक की यात्रा में मुशायरों के स्टेज के साथ फ़िल्मों में उनकी गीतकारी ने भी बड़ी भूमिका निभाई है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें