यह खबर समग्र ग्रोथ की पैरवी करने वाले लोगों के चेहरे खिला सकती है। मुस्लिमों के बीच बेरोजगारी में कमी आई है।
टीओआई की खबर के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में इस समुदाय की बेरोजगारी दर 2004-05 में 2.3 फीसदी से घटकर 2009-10 में 1.9 फीसदी पर आ गई है, जबकि शहरी इलाकों में यह 4.1 फीसदी से घटकर 3.2 फीसदी पर आ गई।
हालांकि, निराश करने वाली बात यह है कि दूसरे समुदायों की तुलना में ग्रामीण और शहरी इलाकों, दोनों जगह ज्यादातर मुस्लिम संगठित वर्कफोर्स का हिस्सा नहीं हैं।
इसके उलट ग्रामीण इलाकों में हिंदुओं की बेरोजगारी दर 1.5 फीसदी पर स्थिर बनी हुई है, जबकि शहरी भारत में पांच साल की अवधि के दौरान यह 4.4 फीसदी से लुढ़ककर 3.4 फीसदी पर आ गई है।
राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संगठन (एनएसएसओ) की ओर से जारी डाटा के मुताबिक मुस्लिम आम तौर पर अपना काम करते हैं या ग्रामीण मजदूरों के रूप में काम करते हैं।
शहरों और कस्बों में मुस्लिम नियमित वेतन/भत्ता श्रेणी में आखिरी पायदान पर हैं। बड़े धार्मिक समूहों में केवल 30.4 फीसदी मुस्लिम ही नियमित नौकरियों में हैं।
इस सूची में सिख (35.7 फीसदी), हिंदू (41 फीसदी) और ईसाई (43 फीसदी) तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति में नजर आ रहे हैं।