संघ की बैठकों में दो मुद्दों पर जरूर चर्चा होती है- कश्मीर घाटी से विस्थापित कश्मीरी पंडितों का निर्वासित जीवन और बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ के कारण असम में अल्पसंख्यक होते हिंदू। नागपुर में शनिवार की बैठक के बाद आरएसएस ने इन दोनों मुद्दों पर अपनी पुरानी नीति को ही दोहराया।
चाहे मुफ्ती को मुख्यमंत्री बनाया जाए या किसी अलगाववादी को छोड़ने की वजह से थोड़ा झटका लगे, लेकिन संघ उम्मीद करता है कि मोदी सरकार कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी कर दिखाएगी।
अलगाववादियों पर नियंत्रण और आतंक का खात्मा वरीयता सूची में कायम हैं। संघ की राय में 'आतंक' की समाप्ति के बिना कश्मीरी पंडितों की हिफाजत संभव नहीं है।
इसी बीच, राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल किए गए सुब्रह्मण्यम स्वामी ने बयान दिया कि मस्जिद या गिरजाघर में ईश्वर का वास नहीं है। संघ उनके इस बयान पर राय देकर विवादों में नहीं पड़ना चाहता।
स्वामी के इस बयान का संबंध रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद से है जिसे सुलझाने के लिए परदे के पीछे प्रयास चल रहे हैं। जब संघ की संसद यानी प्रतिनिधि सभा की बैठक हो रही थी, उस दौरान प्रधानमंत्री पड़ोसी देशों की यात्रा पर थे।
अखंड भारत के विचार को आगे बढ़ा चुके हैं मोदी
संघ के अखंड भारत के विचार को सांस्कृतिक-कूटनयिक सेतु से जोड़ने का काम मोदी शुरू कर चुके हैं। श्रीलंका के जाफना शहर में सागर तट को छूने वाली तलैमन्नार रेल पटरी का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा- 'उस पार मैं रामेश्वरम देख रहा हूँ।' यह बात उन्होंने अनायस नहीं बहुत सोच-समझकर कही है।
महाराष्ट्र और हरियाणा ने गाय काटने पर रोक लगाने के लिए कदम बढ़ाए हैं। आधुनिकता को लेकर संघ के विचारों में हमेशा विरोधाभास दिखता रहा है। मिसाल के तौर पर अत्याधुनिक रेल चाहिए, लेकिन जर्सी नस्ल की गायें नहीं, भारतीय गोवंश की रक्षा उनकी प्राथमिकता है।
भाजपा के पार भी संघ का अपना हिरावल दस्ता है। देशी गायों के पक्ष में श्री गोविंदाचार्य अभियान चला रहे हैं। उनके मार्गदर्शन में स्वाभिमान पार्टी का गठन हो रहा है जिसकी स्थापना बैठक झारखंड के जसीडीह में हो रही है।
गोविंदाचार्य से लेकर भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ और वनवासी कल्याण आश्रम को अपने अपने अभियान चलाने की पूरी छूट जारी रहेगी जिसमें घर वापसी अभियान काफr अहम है।
संघ ने आदिवासी क्षेत्रों में पैठ बढ़ाई
यह संघ की नीति रही है उसने आदिवासी क्षेत्रों में पैठ बढ़ाई है, आदिवासियों और दलितों के बीच ताकत बढ़ाने के लिए भाजपा और संघ के स्तर पर कई फैसले हुए। उदित राज भाजपा की कार्यकारिणी में शामिल किए गए। रामदास अठावले पहले ही राज्यसभा में भेजा जा चुके हैं।
मुरली देवड़ा के निधन से खाली हुई राज्यसभा की सीट पर लगभग अपरिचित साबले को अवसर दिया गया जिनके लिए संघ के प्रिय भाजपा उपाध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्धे और सुब्रह्मण्यम स्वामी के नाम चल रहे थे।
साबले पत्रकार हैं, दलित हैं। भाजपा को बिहार में रामविलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा जैसे लोगों की जरूरत है जिस पर संघ को आपत्ति नहीं है। सहयोगी संगठनों ने प्रतिनिधि सभा में अपनी रपट दी।
भाजपा को हल्की सी छूट थी। कुछ दिन पहले अध्यक्ष अमित शाह संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत से विमर्श करने गए। अमित शाह को स्पष्ट बता दिया गया है कि भाजपा को आरएसएस की लाठी की तरह सक्रिय रहना है। यह सोचकर आत्ममुग्ध न हों कि संघ बैसाखी बनकर हर पसंद-नापसंद पर समर्थन देगा या प्रशस्ति-पत्र बांटता रहेगा।