दिवंगत शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने जिस दिन उद्धव ठाकरे को राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया था उस दिन से वे लगातार अग्नि परीक्षा से गुजर रहे हैं। उनकी आलोचना हुई और पार्टी में बगावत का दौर चला।
इन तमाम झटकों और झंझावात को झेलते हुए उद्धव ने महाराष्ट्र की राजनीति में पैर टिकाए रखा। ऐसा इसलिए संभव हो पाया क्योंकि भाजपा जैसे एक बड़े दोस्त का कंधा उनके साथ था।
उद्धव ठाकरे सन 2004 में शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष बने। उसके बाद शिवसेना के कद्दावर नेता नारायण राणे ने कई विधायकों के साथ पार्टी छोड़ दी।
इससे संभल भी नहीं पाए थे कि चचेरे भाई राज ठाकरे ने बगावत कर दिया और 9 मार्च 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाकर उद्धव ठाकरे के वजूद को ललकारा।
राज ठाकरे ने शिवसेना के मराठी मतों में सेंधमारी कर उद्धव को जोर का झटका दिया। इस बीच उद्धव की पत्नी रश्मि ठाकरे ने पर्दे के पीछे से कमान संभाली और निष्ठावान शिवसैनिकों की फौज तैयार की।