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अबकी बार-यू टर्न सरकार, पढ़ें 1 साल के 7 बड़े यू टर्न

Wed, 11 May 2016 10:37 PM IST
अखिलेश श्रीवास्तव/अमर उजाला, दिल्ली
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सत्ता में लंबे सफर का इरादा हो तो सरपट नहीं दौड़ा जा सकता। सरकार में एक साल पूरा कर चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बेहतर शायद ही कोई यह जानता होगा। सत्ता की मजबूरियों में चुनावी जुमले और वैचारिक प्रतिबद्धताओं की 'बाधाएं' कब परे छूट जाती हैं, पता ही नहीं चलता। चतुर राजनेता आशंकित सियासी दुर्घटनाएं भांप लेते हैं और उन्हें टालने के लिए वे यू-टर्न लेने से भी परहेज नहीं करते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उनमें से एक हैं।
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ऐतिहासिक बहुमत के साथ देश की बागडोर संभालने वाले 'चाय वाले' पीएम की सरकार को विपक्ष इसी यू-टर्न सरकार के तमगे से नवाजता है। पहले सौ दिनों में ही विपक्ष ने एनडीए सरकार को यू-टर्न सरकार की 'उपाधि' देना शुरू कर दिया था। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पलटवार कहते हुए कहा था कि जिन लोगों ने देश पर साठ साल तक राज किया, वो हम से साठ दिनों का हिसाब मांग रहे हैं।

अब तक का सबसे कमजोर विपक्ष कही जा रही कांग्रेस ने सरकार के छह महीने पूरे होने पर बाकायदा एक पुस्तिका छाप यू-टर्न सरकार की पोल खोली थी। इस बुकलेट में वो 25 मुद्दे गिनाए गए जिन पर सत्ता में आने के बाद बीजेपी पूरी तरह मुकर गई। यहां हम उन मुद्दों पर विस्तार से चर्चा करेंगे जिन्हें भारतीय जनता पार्टी और खुद नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी रैलियों में जोर-शोर से उठाया और सत्ता में आते ही उनके वादे सचमुच चुनावी जुमले साबित हुए।
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कानून आया पर काला धन नहीं

शायद ही कोई ऐसी चुनावी रैली हो जिसमें नरेंद्र मोदी ने कालेधन के मुद्दे पर कांग्रेस और यूपीए सरकार को न घेरा हो। उन्होंने देश की जनता से वादा किया था कि वो सौ दिनों के भीतर विदेशों में जमा कालेधन को वापस लाएंगे। हालांकि सत्ता में आने के बाद उनकी पार्टी के अध्यक्ष ने इसे महज चुनावी जुमला करार दे दिया। इस मुद्दे पर ना केवल विपक्ष ने सरकार को निशाने पर लिया बल्कि पार्टी के अंदर भी विरोध में सुर सुनाई दिए। कभी एनडीए सरकार में कानून मंत्री रहे राम जेठमलानी ने तो संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सरकार को इस मसले पर घेरा। रामदेव सरीके मोदी समर्थकों को भी इस मसले पर तीखे सवालों का सामना करना पड़ा।

चारों तरफ से घिरते देख सरकार ने इससे होने वाले राजनीतिक नुकसान की भरपाई के लिए नए कानून का दांव चला और उससे संसद में पास भी करा लिया। भले ही सरकार कानून ले आई हो लेकिन विदेशों में जमा कालेधन को वापस लेने की उसकी नीयत पर अब भी शंका बनी हुई है। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में बनी एसआईटी के बावजूद सरकार इस मसले पर अब तक कानूनी दांव-पेंचों को जरिये केवल टाल-मटोल करती ही नजर आ रही है।

सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में इस मसले पर सुनवाई के दौरान राम जेठमलानी ने तो यहां तक कह दिया कि केंद्र सरकार देश के साथ धोखा कर रही है। जेठमलानी ने कहा कि काले धन के मामले में फंसे नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने की मंशा सरकार में नहीं दिख रही है, क्योंकि उनमें से बहुत लोग ताकतवर हैं और सत्ता के करीब भी। इस सरकार ने भी उन्हीं अधिकारियों को उस पद पर बनाए रखा जो पिछली सरकार में काला धन लाने में रोड़ा थे। ये कुछ तीखे सवाल हैं जिन पर मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट और देश की जनता के सामने जवाब देना है।

भारत बंद बुलाने वाली बीजेपी अब एफडीआई की तरफदार

बीजेपी के नेता 20 सितंबर 2012 की वो तारीख शायद भूल चुके होंगे जब उन्होंने एफडीआई के विरोध में भारत बंद बुलाया था। उमा भारती भी शायद भूल चुकी होंगी जिन्होंने कहा था कि वो सबसे पहली शख्स होंगी जो वालमार्ट की दुकान में आग लगाएंगीं। सुषमा स्वराज को शायद याद न हो लेकिन लोकसभा की कार्यवाही में रिकॉर्ड है कि भारत बंद के कुछ हफ्तों बाद तब की विपक्ष की नेता एफडीआई के खिलाफ संसद में प्रस्ताव लेकर आई थीं।

सात मार्च 2013 को तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने खुदरा कारोबारियों की तरफ से दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित सम्मेलन में कहा था कि अगर भाजपा सत्ता में आती है तो मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई की अधिसूचना को वापस ले लिया जाएगा। मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई के विरोध में अरुण जेटली, मुरली मनोहर जोशी सरीखे वरिष्ठ नेता संसद में अपनी आवाज बुलंद कर चुके हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई के विरोध में 14 सितंबर 2012 को ट्वीट किया था। यूपीए सरकार के दौरान इस मसले पर बीजेपी ने संसद की कार्यवाही को कई दिनों तक बाधित किया था।

अब भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई के पक्ष में आ गई है। डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन (डीआईपीपी) की तरफ से जारी प्रेस सर्कुलर में मल्टीब्रांड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआई को जारी रखा है। सर्कुलर में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की तरफ से मल्टीब्रांड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआई की इजाजत को लेकर जो भी नियम व शर्तें तय की गई थीं, उनमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। हालांकि वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने दावा किया है कि इस मसले पर बीजेपी के रुख में कोई बदलाव नहीं आया है। अब देखने वाली बात ये होगी कि उस समय एफडीआई का विरोध करने वाली भाजपा शासित राज्य सरकारों का रुख अब क्या होगा।

जीएसटी: यूपीए लाए तो खराब, एनडीए लाए तो अच्छा

वित्त मंत्री अरुण जेटली जिस जीएसटी बिल को 1947 के बाद का सबसे बड़ा आर्थिक सुधार का कदम बता रहे हैं यूपीए के सत्ता काल में यही बीजेपी और उसकी सत्ता वाले राज्य इस बिल के पास होने में सबसे बड़ी रोड़ा बनी थी। जब वित्त मंत्री के तौर पर प्रणब मुखर्जी ने इस बिल को सबसे पहले पेश किया था तब बीजेपी की तरफ से ही इसका सबसे ज्यादा मुखर विरोध हुआ था। तब कांग्रेस इसे सबसे बड़ा आर्थिक सुधार बता रही थी और बीजेपी इस राह में सबसे बड़ी रोड़ा थी और अब उसकी जगह कांग्रेस ने ले ली है।

वित्त मंत्री अरुण जेटली जीएसटी पर कांग्रेस के रुख से हैरान हैं और उनका मानना है कि इसमें हो रही देरी से देश का नुकसान हो रहा है। जेटली ने जीएसटी पर कांग्रेस के रुख की आलोचना करते हुए कहा है कि वो इसके फायदों को जानते हुए भी वो बिल के पास होने में बाधा बन रही है और इससे 1 अप्रैल 2016 की डेडलाइन को हासिल करने में दिक्कत होगी।

लोकसभा से दो तिहाई बहुमत से पारित होने के बावजूद जीएसटी बिल राज्यसभा की चौखट नहीं लांघ पाया। राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत नहीं होने के कारण इस बिल को भाजपा सांसद भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में 21 सदस्यीय प्रवर समिति को भेजने का निर्णय लिया गया है। ऐसे में सरकार अब मानसून सत्र में ही बिल के पारित होने की उम्मीद कर रही है।

भारत-बांग्लादेश भूमि हस्तांतरण समझौता (एलबीए)

भारत-बांग्लादेश के बीच सीमा की तस्वीर बदलने वाले 41 साल पुराने जिस एलबीए संविधान संशोधन को बीजेपी ऐतिहासिक करार दे रही है उसे जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ मनमोहन सिंह अंतिम रूप दे रहे थे तो बीजेपी ने ही इसमें अड़ंगा डाला था। अब संसद में बेंचें बदलने के बाद वो कह रही हैं कि उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के काम को आगे बढ़ाया है और इसके लिए वो उन्हें धन्यवाद भी दे रही हैं।

इतना ही नहीं इस संविधान संशोधन विधेयक के समर्थन और सहयोग के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विपक्षी दलों का आभार जताया। मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास जाकर उनका शुक्रिया अदा किया जबकि यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान मनमोहन सिंह की इस पहल का बीजेपी ने विरोध किया था। इस समझौते के बाद माना जा रहा है कि करीब तीस हजार लोगों को भारत की नागरिकता मिलेगी और पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी इसे एक राजनीतिक फायदे के तौर पर देख रही है।

6 मई, 1974 को भारत और बांग्लादेश के बीच हुए जमीन हस्तांतरण समझौते को प्रभावी बनाने के लिए संविधान की पहली अनुसूची को संशोधित किया गया है। समझौते के लागू होने पर अगर बांग्लादेशी इलाके में रहने वाले भारतीय नागरिक वहीं पर रहना चाहते हैं तो उन्हें बांग्लादेश की नागरिकता दी जाएगी और अगर वे भारतीय इलाके में आते हैं तो उनका स्वागत किया जाएगा। इसी तरह भारतीय क्षेत्र में रहने वाले बांग्लादेशी नागरिक वहीं पर रहना चाहते हैं तो उन्हें भारत की नागरिकता दी जाएगी। इस विधेयक में बांग्लादेश के साथ असम, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मेघालय के क्षेत्रों के आदान-प्रदान के समझौते को क्रियान्वित करने का प्रावधान है।

चीन और पाकिस्तान से रिश्ते

पिछले एक साल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से ये तीसरी मुलाकात थी। बीजेपी और नरेंद्र मोदी मनमोहन सरकार को इस बात के लिए कोसते रहे कि उसने पाकिस्तान और चीन के साथ ढुलमुल रवैया अपनाए रखा। वो अपनी चुनावी रैलियों में जोर देते रहे कि अगर सत्ता में आए तो दोनों को करार जवाब देंगे। चुनावी रैलियों में राष्ट्रवाद की भावना को उभारकर वोट हासिल करने की उनकी रणनीति कामयाब भी नजर आई।

शी जिनपिंग जब भारत के दौरे पर थे तब चीनी फौज वास्तविक नियंत्रण रेखा को पार कर भारतीय सीमा में घुस आई थी और प्रधानमंत्री मोदी ने बार-बार कुरेदे जाने के बावजूद चुप्पी साधे रखी। शहीद हेमराज के सिर के बदले सौ सिर काटने के जुमले भी खूब चले हालांकि अपार बहुमत से सत्ता में आए मोदी सारी बातें भूल यथार्थ की सियासत करने लगे। प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में पहली बार किसी पाकिस्तानी वजीरे आजम को बुलावा भेजा गया। इतना ही नहीं भारत के ऐतराज के बावजूद कश्मीरी अलगाववादियों से भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने सरकार की नाक के नीचे मुलाकात की। हालांकि बाद में सरकार ने सचिव स्तर की होने वाली वार्ता को रद्द कर दिया।

रेल किराया: जिसके लिए यूपीए को कोसा वही किया

सात मार्च 2012 को नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट किया और कहा कि संसद सत्र से ठीक पहले रेल किराया बढ़ाना अनुचित है। उन्होंने कहा कि वो इस मसले पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखेंगे। सत्ता में आते ही खुद की सरकार ने जब यही काम किया तो शायद उन्हें अपना ट्वीट भी याद नहीं रहा। एनडीए सरकार ठीक उसी तरह अपनी बात से मुकर गई जैसे कि बेपटरी होती कोई रेल।

मोदी सरकार से पहले तक ज्यादातर गठबंधन सरकारों का दौर रहा और इन सरकारों ने अपने साथी दलों की मजबूरी के चलते ही सही रेल किराया बढ़ाने से परहेज किया। जिस बात के लिए बीजेपी ने मनमोहन सरकार को जमकर कोसा, सत्ता में आने के तुरंत बाद उस पर यू टर्न ले लिया।

नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक चिट्ठी लिखी थी और रेल बजट से ठीक पहले बढ़ाए हुए रेल किराए को वापस लेने की भी मांग की थी। नरेंद्र मोदी ने तब आरोप लगाया था कि सरकार ने संसद को अनदेखा कर रेल किराया बढ़ाया गया। लेकिन मोदी सरकार ने एक बढ़ा यू टर्न उस समय लिया जब उन्होंने खुद के रेल बजट से पहले रेल किराए में बढ़ोतरी का ऐलान कर दिया।
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पारदर्शिता, जवाबदेही, अहम नियुक्तियां और आरटीआई

नरेंद्र मोदी का शायद ही कोई ऐसा भाषण हो जिसमें वो ट्रांसपेरेंसी (पारदर्शिता) और एकाउंटबिलिटी की बात न करते हों। पर उनकी सरकार के एक साल का जो प्रदर्शन रहा है, इस पर वो खुद खरे नहीं उतरते। यही वजह है कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इन मसलों पर सीधा हमला बोला। मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी), केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) और लोकपाल की नियुक्ति अब तक नहीं हो पाने को आधार बनाते हुए सोनिया ने पीएम पर पारदर्शिता के मुद्दे पर सरेआम अपनी बात से पलटने का आरोप मढ़ा। यही नहीं उन्होंने यहां तक कहा कि भाजपा सरकार आरटीआई अधिनियम को निष्प्रभावी बनाने पर तुली है।

उन्होंने सरकार पर आरोप मढ़ा कि आम जनता को अब सरकार से सीधे सवाल करने का अधिकार नहीं रह गया है। अभी तक सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और कैग को आरटीआई के तहत जवाबदेह नहीं होने और सार्वजनिक जांच से छूट थी, लेकिन भाजपा सरकार आने के बाद अब इस दायरे में पीएमओ और कैबिनेट सचिवालय भी आ गए हैं। सोनिया ने आंकड़ों के जरिए सरकार पर वार करते हुए कहा कि करीब आठ महीने से सीआईसी का पद खाली है और तीन सूचना आयुक्तों के पद एक साल से खाली पड़े हैं जिसके चलते 39 हजार सूचना के अधिकार के मामले लंबित पड़े हैं। उन्होंने हमला बोला कि सूचना देने में देरी सूचना नहीं देने के समान है। उन्होंने पीएम को उनके पारदर्शिता और सुशासन के वायदों को याद दिलाते हुए कहा कि गलत काम करने वालों को संरक्षण प्रदान करना किसी भी सरकार के नैतिक मूल्यों का हिस्सा नहीं हो सकता है।
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