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दंगे के दो साल : कभी न आए उन्माद का ऐसा जलजला

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सात सितंबर-2013। इस दिन को शायद ही कोई भूल पाए। नफरत का ऐसा जलजला आया कि सदियों के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर गया। किसी के बुढ़ापे का सहारा छिना तो किसी का सुहाग उजड़ा। हिंसा में 65 से ज्यादा लोग बेमौत मारे गए। गांवों से बस्तियां उजड़ गईं, हजारों लोग बेघर हो गए। दो साल बाद भी गलियां सूनी और लोग दर-ब-दर हैं।
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सात सितंबर की नंगला मंदौड़ पंचायत के बाद शाम ढलते-ढलते हिंसा भड़क गई थी। पंचायतों से ग्रामीण घर नहीं लौटे तो खून-खराबा शुरू हो गया। आठ सितंबर की सुबह मुजफ्फरनगर और शामली के लिए कहर बनकर आई। कई गांवों में हिंसा का नंगा नाच हुआ। बस्तियां आग के हवाले कर दी गईं। बेगुनाहों की लाशें बिछा दी गईं।

क्या बच्चे, क्या बूढ़े चीख और चीत्कार से कराह रहे थे। पचास हजार से ज्यादा लोग बेघर हो गए। हिंसा का सबसे ज्यादा खूनी खेल कुटबा गांव में हुआ। एक-एक कर आठ बेगुनाहों का कत्ल कर दिया गया। वक्त रहते आर्मी पहुंच गई, वरना मौतों की संख्या और बढ़ सकती थी। कत्लोगारत की दहशत से पसरी खामोशी आज तक नहीं टूट पाई।
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कार से खींचकर की लोगों की हत्या

गांव की मसजिद पर ताला पड़ा है और घरों में झाड़-झंखाड़ खड़े हैं। लाखों की कीमत के मकान खंडहर बन गए हैं। दरवाजे और चौखटें गायब हैं। सिसौली क्षेत्र के मुंडभर में भी भाईचारा कलंकित हो गया। धर्मस्थल में तोड़फोड़ के साथ घरों में आग लगा दी गई। लोनी से लौटते समय मुंडभर का इलियास उर्फ पोदा बलवाइयों के हत्थे चढ़ गया।

कार से खींचकर उसकी हत्या कर दी गई और शव को नहर में बहा दिया गया। काकड़ा गांव ने भी तीन मौतों को झेला। नंगला मंदौड़ पंचायत से गांव लौटते वक्त पुरबालियान में हुए हमले में विपिन, महेंद्र और राजवीर की मौत हुई।

आक्रोश में काकड़ा की एक समुदाय की बस्ती में आगजनी और तोड़फोड़ हुई, सैकड़ों लोग घर छोड़ गए। फुगाना इलाका भी दंगे में सुलगता रहा। दो बेगुनाहों की हत्या कर दी गई। महिलाओं से दुष्कर्म के मामले सामने आए। बेघर लोगों ने राहत शिविरों में शरण ली।

वक्त ने भर दिए नफरत के जख्म

सात सितंबर की उस मनहूस घड़ी में इंसान ही इंसान के खून का प्यासा हो गया। धर्म के उन्माद में न कसूर देखा गया न ही इंसानियत। नतीजा, 65 से ज्यादा बेगुनाहों की लाशें बिछा दी गईं। दंगे को दो साल बीत गए, काफी कुछ बदल चुका है। गुजरे वक्त की एक तस्वीर यह भी है कि जो हिंसा का शिकार हुए, उनके नौकरी पाए आश्रित अब साथ काम करते हैं, हंसते-बोलते हैं और मन की पीड़ा साझा करते हैं।

कलक्ट्रेट हो या दूसरे सरकारी दफ्तर। मुजफ्फरनगर दंगे में मारे गए लोगों के आश्रितों को देखकर यह नहीं लगता कि इनका धर्म और मजहब को लेकर कोई बैर रहा है। कवाल की दर्दनाक घटना में जान गंवाने वाले मलिकपुरा के सचिन की पत्नी स्वाति नजारत में तैनात है। यहीं पर मीरापुर के सिकरेड़ा गांव की रुखसाना भी काम करती है, इनके पति नदीम की दंगे में मौत हो गई थी।

स्वाति और रुखसाना एक-दूसरे का दर्द बांटती हैं, मन की बातें करती हैं। उन्हें नहीं लगता कि दंगे की कोई वजह थी। सियासत और उन्मादियों ने बेगुनाहों की दुनिया उजाड़ दी। हिंसा भड़कने के बाद बलवाइयों ने शहर के खालापार में पत्रकार राजेश वर्मा और चाट विक्रेता दामोदर शर्मा की हत्या कर दी थी।

दंगे ने छीना पिता का साया

दोनों के वारिस सारांश वर्मा और अर्जुन शर्मा नजारत में कार्यरत हैं। वह कहते हैं कि दंगे ने पिता का साया छीन लिया। उनकी कमी को कभी पूरा नहीं किया जा सकता। जिंदगी का मुश्किल सफर वक्त के साथ गुजर रहा है। दोनों ही समुदाय के मृतक आश्रित मिलकर काम करते हैं। साथ बैठकर खाना खाते हैं और एक-दूसरे की मदद को तैयार रहते हैं।

नजारत में ही काम कर रहे रहमतपुर गांव के मृतक अजय कुमार के बेटे सरजीत का भी मानना है कि नफरत से फैली हिंसा से नुकसान के अलावा कुछ हासिल नहीं होता। कुटबा की हिंसा में मृतक इरशाद की पत्नी वसीमा, बघरा के मृतक राजूद्दीन की पत्नी मेहराज, खेड़ी फिरोजाबाद के मृतक लताफत की पत्नी हसीना और गांव तेवड़ा के मो. सुलेमान उर्फ सद्दाम की पत्नी खातून को पीडब्लूडी में बतौर बेलदार की नौकरी मिली।

यहीं पर रसूलपुर जाटान के मृतक नरेश शर्मा की पत्नी गुड्डी भी कार्यरत है। नौकरी की दिनचर्या में एक-दूसरे से वास्ता पड़ता है। किसी तरह का कोई मनभेद नहीं है। शाहपुर के कुटबा गांव में भारी तबाही मची थी। आठ लोग मारे गए थे। उनके आश्रित अब नजारत और पीडब्लूडी में एक साथ काम करते हैं।

पढ़े-लिखे को मिली थी अच्छी नौकरियां

अखिलेश सरकार ने मृतकों के आश्रितों को अनुकंपा के आधार पर नौकरियां देकर पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाया। अच्छे पढ़े-लिखे वारिसों को समूह ग की नौकरियां मिलीं। मलिकपुरा के गौरव की बहन शैली, शहर के इकबाल की बेटी इंशा इकबाल और शोरम के मृतक विपिन की पत्नी सुनीता को डायट में एक साथ लिपिक की नौकरी मिली हुई है।

बसेड़ा के मृतक ब्रजपाल सिंह के पुत्र प्रांजल, भोकरहेड़ी के मृतक सोहनवीर सिंह के पुत्र योगेश, काकड़ा के मृतक महेंद्र के पुत्र पुष्पेंद्र और मृतक विकास उर्फ कल्लू के पुत्र अविनाश को पंचायती राज विभाग में ग्राम पंचायत अधिकारी बनाया गया है।  

दंगे से हिली अखिलेश सरकार ने जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति विष्णु सहाय आयोग का गठन किया था। दो साल से जांच चल रही है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव दो बार आयोग का कार्यकाल बढ़ा चुके हैं, बावजूद इसके अभी भी रिपोर्ट का इंतजार है। विष्णु सहाय आयोग ने मुजफ्फरनगर में कैंप बनाकर दंगा पीड़ितों के बयान लिए थे।

साथ ही हिंसा के दौरान प्रदेश और जिले में तैनात आईएएस और आईपीएस अफसरों को बयान के लिए तलब किया गया था। अब जिले से आयोग का कार्यालय समाप्त हो चुका है। फिलहाल लखनऊ में जांच आयोग प्रक्रिया पूरी करने में लगा है।

सबसे अहम पहलू यह है कि दंगे में जिन अफसरों ने चूक की, उनमें से कई अभी भी वेस्ट यूपी में तैनात हैं। मुजफ्फरनगर दंगे का असर मेरठ, बिजनौर, बागपत, शामली में भी पड़ा था, जहां अलग-अलग सांप्रदायिक घटनाओं में कई मौतें हुई थीं। हालांकि सरकार ने फौरी तौर पर तत्कालीन एसएसपी सुभाषचंद्र दुबे को सस्पेंड कर दिया था। बाद में उन्हें बहाल भी कर दिया था।

कानून के शिकंजे से बच गईं कई हस्तियां

सात सितंबर और 31 अगस्त की नंगला मंदौड़ पंचायत तथा खालापार में हुई सभाओं को लेकर दर्ज किए गए मुकदमों में कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। दो साल बाद भी कई आरोपी कानून के शिकंजे से बाहर हैं। धारा-188 के तहत की गई कार्रवाई अदालत में विचाराधीन है।

कवाल में तिहरे हत्याकांड के बाद जिले की फिजा खराब होती गई। मलिकपुरा के मृतक गौरव और सचिन की श्रद्धांजलि सभा 31 अगस्त 2013 को नंगला मंदौड़ में रखी गई, जिसमें बिजनौर सांसद भारतेंद्र सिंह, विधायक सुरेश राणा, केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री डॉ संजीव बालियान, उमेश मलिक, यशपाल पंवार, अशोक कटारिया, पूर्व विधायक अशोक कंसल, पूर्व सांसद हरेंद्र मलिक और सोहनवीर सिंह आदि लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।

इसके बाद सात सितंबर को फिर उसी मैदान में पंचायत हुई, जिसमें कैराना सांसद हुकुम सिंह, भाकियू अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत, राकेश टिकैत, विधायक संगीत सोम, बाबा हरिकिशन मलिक, स्वामी ओमवेश, सांसद भारतेंद्र समेत अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। जांच में भाकियू नेताओं समेत अन्य लोगों के खिलाफ केवल 188 की कार्रवाई हुई, जिससे कोर्ट में मामला विचाराधीन है।

इससे पूर्व 29 अगस्त को खालापार में जुमे की नमाज के बाद सभा हुई, जिसमें पूर्व गृह राज्यमंत्री सईदुज्जमां, उनके बेटे सलमान सईद, पूर्व सांसद कादिर राना, विधायक मौलाना जमील, नूरसलीम राना समेत अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। मुकदमे दर्ज होने के बाद धारा-188 के तहत कार्रवाई अदालत में विचाराधीन है। वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल जिंदल बताते हैं कि उक्त धारा में दोषी पाए जाने पर एक से छह माह तक की सजा का प्रावधान है।

फेसबुक से नहीं मिली जांच रिपोर्ट

सरधना के भाजपा विधायक संगीत सोम के फेसबुक एकाउंट से कवाल कांड की कथित वीडियो क्लिप शेयर करने के मामले का दो साल बाद भी खुलासा नहीं हो पाया है। एमएलए की फेसबुक एकाउंट से कवाल की कथित वीडियो क्लिप शेयर करने के मामले से सियासत गरमा गई थी।

सोम के खिलाफ कोतवाली में मुकदमा अपराध संख्या 1118/13 पर धारा 153ए, 420, 120बी एवं 66ए आईटी एक्ट में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। विधायक को गिरफ्तार कर जेल भेजने के साथ ही रासुका भी लगाई गई थी। तफ्तीश के दौरान पुलिस ने फेसबुक मुख्यालय को चिट्ठी लिखी थी, लेकिन दो साल बाद भी उसका कोई जवाब नहीं आया।

11 लोगों की नहीं मिली लाशें

दंगे की भेंट चढ़े लिसाढ़ गांव के 11 लोगों की लाशें दो साल बाद भी पुलिस बरामद नहीं कर सकी। इतना ही नहीं हिंसा के दौरान लापता हुए आठ लोगों का भी सुराग नहीं लग सका, जिस कारण दंगे का दंश झेल रहे 19 परिवारों को शासन की ओर से किसी प्रकार की कोई आर्थिक सहायता नहीं मिल सकी है।

फुगाना क्षेत्र दंगे में सर्वाधिक प्रभावित हुआ। लिसाढ़ गांव में भी कई ग्रामीणों के कत्ल कर दिए गए। इस गांव के 11 ग्रामीणों की हत्या प्रशासन स्वीकार कर चुका है, मगर आज तक उनके शव बरामद नहीं हो सके।

फुगाना थाने में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार दंगे में लिसाढ़ निवासी अजमुद्दीन उसकी पत्नी हलीमन, वकील पत्नी यामीन, करमुद्दीन पुत्र कमालूद्दीन, सिराजुद्दीन पुत्र इद्दू, हमीदन पत्नी सिराजुद्दीन, उमरदीन पुत्र सद्दीक, हकीमुद्दीन पुत्र बंदा, उसकी मां छोटी, हाजी नब्बू पुत्र नकली और नसीरुद्दीन पुत्र करीमुद्दीन की हत्या हुई थी, मगर दो साल बाद भी पुलिस उनके शव बरामद नहीं कर सकी।

दंगे के दौरान कई लोग लापता हुए थे, जिसे दो बरस बाद भी पुलिस तलाश नहीं कर सकी। प्रशासन के रिकार्ड के अनुसार खालापार के किदवईनगर निवासी आसिमा पत्नी इसराइल, न्याजूपुरा निवासी मोहम्मद आसिफ पुत्र मोहम्मद हयात, बिलासपुर निवासी शौकीन पुत्र लाशीम, जानसठ के गांव काटका निवासी नजीर पुत्र नसीर, भोपा के किशनपुर निवासी निसार पुत्र हसन अली, भौराकलां के गांव हड़ौली निवासी जुम्मा पुत्र दीन मोहम्मद, शाहपुर के गांव शौरा निवासी गुलफाम पुत्र मेहरदीन, गांव सिम्भालका निवासी अब्दुल हमीद पुत्र मकबूल दंगे के दौरान लापता हो गए थे।

दंगा पीड़ित 952 परिवारों को मिले 47.60 करोड़

दो साल पहले जिले में भड़की सांप्रदायिक हिंसा के शिकार हुए पीड़ित 952 परिवारों को शासन ने एक मुश्त पुनर्वास सहायता के रूप में 47 करोड़ 60 लाख रुपये की धनराशि आवंटित की है। सहायता पाने वाले सभी परिवार मुस्लिम समुदाय के हैं।

कवाल कांड को लेकर सात सितंबर 2013 को नंगला मंदौड़ में हुई पंचायत से लौटते ग्रामीणों पर सुनियोजित ढंग से हमले हुए। लाशें बिछती चली गईं। पूरा जिला दंगे की चपेट में आ गया। सांप्रदायिक दंगे में शाहपुर, बुढ़ाना और फुगाना क्षेत्र के गांव सर्वाधिक चपेट में आए। इन गांवों में रहने वाले मुस्लिम समाज के लोग दंगे की भेंट चढ़े।

मुस्लिम जान बचाने को घर गांव छोड़कर जंगल में जा छिपे। बाद में उन्होंने शरणार्थी शिविरों में पनाह ली। दंगे रुकने पर शासन ने गांव छोड़ गए परिवारों को एक मुश्त पुनर्वास सहायता के रुप में पांच-पांच लाख रुपये प्रति परिवार धनराशि आवंटित की।

शासन ने 64.12 लाख रुपये की सहायता दी

दंगे से प्रभावित 952 परिवारों को पांच लाख के हिसाब से 47 करोड़ 60 लाख रुपये प्रदान किए, जिसमें फुगाना के 342 परिवारों, काकड़ा के 215, कु टबा के 216, कुटबी के 61, मोहम्मदपुर रायसिंह के 88 और मुंडभर के 30 परिवारों को पुनर्वास सहायता दी गई।

शासन ने दंगे में चल अचल संपत्ति के नुकसान की भरपाई के लिए भी 62 परिवारों को नुकसान के अनुसार आर्थिक सहायता दी है। सहायता पाने वाले 55 परिवार देहात के और पांच शहर के हैं। सहायता पाने वाले परिवार खरड़, नाला, सरवट, मोहम्मदपुर माडन, खांजापुर, जानसठ देहात, बुढ़ाना, अटाली, अलीपुरकला के है। शासन ने इन परिवारों को 64 लाख 12 हजार 160 रुपये की सहायता प्रदान की है।
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शिविरों में हुई थी 12 नौनिहालों की मौत

दंगे के बाद शरणार्थी शिविर में रह रहे परिवारों के 12 मासूम बच्चों की मौत हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर शासन ने प्रत्येक बच्चे के माता-पिता को दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी है। शासन ने 12 बच्चों के परिजनों को 24 लाख रुपये सहायता के लिए दिए हैं।

दो साल पहले जिले में दंगा भड़कने के बाद मुस्लिम समाज के लोग जान बचाने के लिए घर और गांव छोड़कर जंगल में चले गए थे। जिन्हें बाद में सहायतार्थ शरणार्थी शिविरों में पनाह मिली थी। विभिन्न शिविरों में रहने के दौरान 12 मासूम बच्चों की भी मौत हो गई थी।

शिविरों में हुई बच्चों की मौत को सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से लिया और 26 मार्च 2014 को अपने निर्णय में कैंपों के दौरान प्रवासी परिवारों के मरे बच्चों को दो-दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता के आदेश दिए थे। उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुपालन में शासन ने सभी मृतक बच्चों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान कर दी।

दंगे के दौरान महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले भी दर्ज हुए थे, जिनमें से एसआईटी ने फुगाना थाने पर दर्ज दुष्कर्म के छह मामलों को सही माना था। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में बलात्कार पीड़िताओं के पुनर्वास के लिए पांच-पांच लाख रुपये आर्थिक सहायता के रूप में देने का निर्णय सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में शासन ने फुगाना की छह पीड़िताओं को पांच-पांच लाख के हिसाब से 30 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी है।
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