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फेसबुक ने कराया 11 साल से बिछड़े भाइयों का मिलन

Wed, 31 Jul 2013 11:44 AM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
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अक्सर फिल्मों में दिखने वाली घटनाएं असल जिंदगी में भी हो जाती हैं। फिल्मों से मिलता जुलता वाकया हुआ पुणे के एक परिवार के साथ।
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फिल्मी कहानी की तरह ही इस परिवार के दो भाई बचपन में अलग हो गए और फिर मिले तो 11 साल बाद और इसका जरिया बनी सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक।

पुणे के रहने वाले 22 साल के संतोष दोमले और 24 साल के अंकुश दोमले बचपन में बिछड़ गए थे। अंकुश 13 साल की उम्र में परिवार को छोड़ घर से भाग गया था।

फेसबुक पर मिला भाई
मॉर्डन कॉलेज से बीकॉम कर रहा संतोष अपना अधिकतर समय फेसबुक पर बिताता था जिसके चलते उसे कई बार मां से डांट भी पड़ती थी। हांलाकि यही फेसबुक उसके लिए खुशी लेकर आया।

एक रात करीब 1 बजे फेसबुक प्रोफाइल पर मराठी में एक मैसेज आया। मैसेज में लिखा था कि 'मैं तुम्हारा भाई हूं। मुझे फोन करो'। संतोष ने जब पूरा मैसेज देखा तो पता चला की मैसेज भेजने वाला अंकुश है।
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अंकुश की दाढ़ी और पगड़ी देखकर संतोष उसे पहचान नहीं पाया। वह सरदार की तरह दिख रहा था। तब संतोष ने अपनी मां को जगाकर अंकुश की तस्वीर दिखाई। अंकुश की भौंहें और गालों पर एक कटने के निशान को देखकर मां अपने बड़े बेटे अंकुश को पहचान गई।

पिता की मृत्यु के बाद चला गया
अंकुश के मुताबिक जब वह 11 साल और संतोष नौ साल का था तो उनके पिता की मृत्यु हो गई। इसका अंकुश पर बहुत बुरा असर पड़ा। वह अपने घर से जितना हो सके दूर रहने लगा और अधिकतर दोस्तों के साथ घूमने लगा।

एक दिन अंकुश अपने अंकल की गाड़ी ले गया। बाइक की किसी गाड़ी से टक्कर हो गई और बाइक को नुकसान पहुंचा। जब अंकुश वापस लौटा तो अंकल ने उसकी पिटाई की और उसकी मां से शिकायत कर दी।

यह देख मां भी गुस्से में तमतमा गई और अंकुश की पिटाई कर दी। मां ने 50 रु. का नोट फेंककर अंकुश को घर छोड़कर जाने के लिए कह दिया।

तब 13 साल की उम्र में अंकुश घर छोड़कर चल गया।

लुधियाना में बना सिख
अंकुश ने बताया कि उसने 50 रु. में वडा पाव खाया। उसे मुंबई से नांदेड़ तक जाने वाला एक सिख ट्रक ड्राइवर मिला।

अंकुश के मुताबिक ड्राइवर ने उसे एक गुरुद्वारे में छोड़ दिया। अंकुश गुरुद्वारे के लंगर में सेवा करने लगा। 2013 में लुधियाना के गुरुद्वारे से आए एक शख्स बाबा मेजर सिंह ने अंकुश को काम करते हुए देखा और उसके काम से प्रभावित हो गए।
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बाबा अंकुश को लुधियाना ले गए। वहां पर अंकुश सिख बन गया और अपना नाम गुरूबाज सिंह रख लिया। अंकुश लोगों दान में मिले गेहूं को गुरूद्वारे तक पहुंचाने का काम करने लगा।

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