इसे राजनीतिक समीकरणों की जरूरत कहें या फिर महज संयोग मगर फिलहाल हकीकत तो कुछ ऐसी ही बन पड़ी है कि प्रधानमंत्री पद की दावेदारी की उड़ान भर रहे भाजपा के चुनावी चेहरे नरेंद्र मोदी के लिए उत्तरप्रदेश ही नहीं गुजरात में भी पार्टी के ब्राह्मण नेता को अपनी सीट की कुर्बानी देनी पड़ी है।
वाराणसी से जहां उत्तरप्रदेश से भाजपा के सबसे बड़े ब्राह्मण चेहरे मुरली मनोहर जोशी को अनमने ढंग से काशी को त्यागना पड़ा वहीं वडोदरा से बालू शुक्ला को मोदी के लिए अपनी संसदीय सीट छोड़नी पड़ी है।
वाराणसी सीट तो जोशी कहीं से छोड़ने को तैयार नहीं थे। लेकिन मोदी के लिए उन्हें भाजपा हाईकमान ने कानपुर शिफ्ट कर दिया।
जोशी और शुक्ला पर भारी पड़े मोदी
जोशी किस तरह वाराणसी के लिए लालायित थे इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने एकबारगी तो यहां तक कह दिया कि पाप किया तो संसद गया और पुण्य किए तो काशी मिली।
लेकिन जोशी की भावनाएं भाजपा में मोदी के सियासी पराक्रम के आगे बौनी साबित हुईं। मन मसोस कर उन्हें काशी छोड़ कानपुर का रुख करना पड़ा।
हालांकि वडोदरा से सांसद बालू शुक्ला मोदी के लिए अपनी सीट की कुर्बानी देने पर कोई टीस जाहिर नहीं कर रहे बल्कि इसके उलट वह अपना गौरव समझते हैं।
बदल रही राजनीति में ब्राह्मण कहां?
शुक्ला ने ‘अमर उजाला’ से कहा कि उनके लिए यह कुर्बानी नहीं बल्कि हर्ष की बात है। जो व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है उसके लिए सीट छोड़ना उनके लिए किसी गौरव से कम नहीं है। बालू शुक्ला वैसे तो चार-पांच पीढ़ियों से गुजरात में रह रहे हैं मगर उनके पुरखों की जड़ें महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश में रही हैं।
इस चुनाव में मोदी को पीएम बनाने के लिए पिछड़ा कार्ड खुलकर खेल रही भाजपा अपने इस दांव को भुनाने के लिए वाराणसी और वडोदरा का यह प्रयोग सीधे न सही मगर परोक्ष रूप से तो दिखा ही सकती है। खासकर यह देखते हुए कि जब एक समय में प्रधानमंत्री बनने के लिए ब्राह्मण होना करीब-करीब एक अनिवार्य योग्यता होती थी।
जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, राजीव गांधी, पीवी नरसिम्हा राव और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे ब्राह्मण चेहरों ने बतौर प्रधानमंत्री देश पर लंबे समय तक राज किया। लेकिन अब देश की राजनीति का चरित्र साफ तौर पर बदलता दिखाई दे रहा है। अब यह अनिवार्यता निश्चित रूप से हाशिए पर जा चुकी है। कांग्रेस हो या फिर भाजपा यह अनिवार्यता अब इनके लिए भी मायने नहीं रखती है। वैसे भी बदलते जातीय-सियासी समीकरणों में राजनीतिक दलों का इसके अनुरूप दांव चलना कोई अजूबा नहीं।