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सुनामी में नष्ट हुए समुद्री मूंगे, बदल दिया जीवों का बिहेवियर

Tue, 12 Mar 2013 11:35 AM IST
कानपुर/विवेकानंद त्रिपाठी
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अगर जल्द नहीं चेते, तो सुनामी के गहरे दंश, देश के समुद्रतटीय प्रदेशों के साथ-साथ नदियों के किनारे बसे लोग और सारी दुनिया झेलेगी। सदी की इस भयानक प्राकृतिक आपदा में नष्ट हुए समुद्री मूंगों (कोरल) से इसकी आहट साफ सुनाई देने लगी है।
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यही नहीं समुद्री जीवों के ‘बिहेवियर’ में भी चौंकाने वाले परिवर्तन आए हैं। यह सनसनीखेज खुलासा पोर्ट ब्लेअर (अंडमान) में ‘पर्ल एक्वा कल्चर रिसर्च फाउंडेशन’ के चेयरपर्सन डॉ. अजय सोनकर ने किया है।

डॉ.सोनकर निजी काम से कानपुर आए थे। खास बातचीत में उन्होंने समंदर के सीने में उठ रहे इस नए तूफान से आगाह किया। उन्होंने कहा कि इस पर योजनाबद्ध शोध और निदान के उपाय करने की जरूरत है।
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समुद्री सीपों के शोधकार्य में लगे डॉ. सोनकर ने सुनामी के बाद समुद्र के भीतरी दुनिया में हो रहे परिवर्तन को पहली बार रेखांकित किया है।

वे उस समय हैरत में पड़ गए, जब उनके प्रोजेक्ट एरिया में बहुतायत से रहने वाली ‘तोता मछली’ (पैरट फिश) ने उनके ‘सीपों’ को मारना शुरू कर दिया। उस समय उन्हें किसी नए परभक्षी के समुद्र में आने की आशंका हुई।

पर एक दिन जब वहां के मछुआरों ने उन्हें बताया कि पहले उनकी डोंगियों (छोटी नावों) की तली में बहुत से समुद्री जीव चिपक जाया करते थे, जिनकी साफ सफाई के लिए उन्हें डोंगी को पानी से बाहर निकालना पड़ता था। पर सुनामी के बाद से उनकी डोंगियों के तले साफ रह रहे हैं।

इस जानकारी के बाद डॉक्टर सोनकर ने इसकी गहन छान-बीन की तो पता चला कि सीपों को कोई नया परभक्षी नहीं बल्कि मूंगों की पथरीली परत पर भोजन के लिए आश्रित ‘तोता मछली’ ही आहार बना रही है। उसकी ‘फूडिंग हैबिट’ में आए बदलाव को जानकर डॉ. सोनकर को बड़ी हैरानी हुई।

ऐसे बदला बिहेविअर
दरअसल मूंगे (कोरल) समुद्र में खास वातावरण में पनपते हैं। सुनामी में समुद्र के नीचे का पानी तेजी से ऊपर आया और अपने साथ भारी मात्रा में बालू भी ऊपर लाया, जिससे मूंगे उसके नीचे दबकर नष्ट हो गए।

सुनामी से पहले इन मूंगों की बेहद खूबसूरत दुनिया थी। खास बात यह है कि इस बालू का उत्पादन करने वाली ये ‘तोता मछली’ ही हैं। ये मछलियां मूंगे की पथरीली परत को खाती हैं और उन्हें पीसकर बालू बनाती हैं।

मूंगों के नष्ट होने के बाद अब ये सीपों को खाने लगी हैं। यह समूचे ईकोलॉजिकल सिस्टम के लिए बड़ी आपदा का संकेत है। दरअसल ये सीप पानी को फिल्टर करके शुद्ध करते हैं, जिससे कोरलों और अन्य समुद्री जीवों (फ्लोरा-फौना) के फलने- फूलने के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्माण होता है।

इनके समाप्त होने से समुद्र का जल इतना प्रदूषित हो जाएगा कि उसमें रहने वाले सभी जीव जंतुओं के अस्तित्व पर संकट आ जाएगा। बकौल डॉ. सोनकर भारत ही नहीं सारी दुनिया का पर्यावरण विषाक्त हो जाएगा।

नए ‘कोरल बेड’ विकसित होने में कम से कम 30 साल लगेंगे। अगर इस बीच कोई और आपदा आ गई तो क्या होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है। इस बात की भी कोई गारंटी नहीं कि तोता मछलियां अपने पुराने फूड हैबिट पर लौट ही आएं।

ये होंगे नुकसान
:- समुद्र में बढ़ता प्रदूषण इन्हें प्रभावित करेगा
:- ओजोन परत के निर्माण पर बुरा असर
:- बारिश और आर्द्रता में कमी आने लगेगी
:- समुद्री पर्यावरण धरती के स्वास्थ्य का थर्मामीटर है
:- धरती के अच्छे स्वास्थ्य के लिए समुद्र का स्वस्थ रहना जरूरी

डॉ. अजय सोनकर
यहां बता दें कि डॉ. सोनकर ने पहली बार ‘फ्रेश वाटर’ में प्राकृतिक मोतियों को विकसित करने की तकनीक विकसित की। उनके पहले फ्रेश वाटर में मोती बनाने में जापान का एकाधिकार था। पर उनके मोती बहुत छोटे आकार के होते थे, साथ ही उनकी मृत्युदर (मॉर्टलिटी रेट) बहुत ज्यादा थी।

डॉ. सोनकर ने न केवल उनकी मार्टलिटी पर जबर्दस्त नियंत्रण किया, बल्कि ‘फ्रेश वाटर’ में 22 मिलीमीटर तक का मोती विकसित कर इतिहास रच दिया। यही नहीं ‘ब्लैक पर्ल’ (काला मोती) भी सबसे पहले उन्होंने विकसित किया।

1991 में अपने बूते गृह जनपद इलाहाबाद से शुरू हुआ उनका यह सफर अंडमान में एक बड़े शोध संस्थान का रूप ले चुका है। 2003 से वे अंडमान में ब्लैक पर्ल बनाने वाली अनोखी भारतीय प्रजाति (मार्गरिटिफेरा) पर शोध कर रहे हैं।
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