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यूपी की बेटी का कमाल, पहुंची सबसे ऊंचे ज्वालामुखी पर

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पहाड़ों से भी ऊंची है मेरठ की बेटी तूलिका रानी की जिद, साहस और इच्छाशक्ति। इसी के बूते वह दुनिया के दुर्गम और ऊंचे पहाड़ों पर तिरंगा फहरा रही हैं। तूलिका अब ईरान और मध्य-पूर्व एशिया के अल्बोर्स माउंटेन रेंज की सबसे बड़ी चोटी और एशिया के सबसे ऊंचे ज्वालामुखी दामावंद पर फतह कर लौटी हैं।
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अपनी भौगोलिक स्थितियों और वातावरण के कारण 5671 मीटर ऊंची यह चोटी दुनिया में सबसे दुर्गम मानी जाती है। यह सफलता अर्जित करने वाली वह पहली भारतीय महिला हैं। उनके इस अभियान को अमर उजाला ने प्रायोजित किया था। तूलिका 8848 मीटर ऊंचे माउंट एवरेस्ट समेत दुनिया की कई ऊंची चोटियों पर सफलतापूर्वक अपना अभियान पूरा कर चुकी हैं।

ईरान माउंटेनियरिंग फेडरेशन (ईरान पर्वतारोहण महासंघ) की ओर से 21 से 31 जुलाई तक इंटरनेशनल क्लाइंबिंग मिशन का आयोजन किया गया। यूनियन ऑफ इंटरनेशनल अल्पाइन एसोसिएशन (यूआईएए) द्वारा प्रमाणित इस मिशन में ब्राजील, ईरान, ब्रिटेन, हॉलैंड, पोलैंड, जापान और आस्ट्रिया समेत 16 देशों के 53 पर्वतारोहियों ने हिस्सा लिया। इसमें एयरफोर्स एकेडमी हैदराबाद में स्कवैड्रन लीडर तूलिका ने भारत का प्रतिनिधित्व किया।
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मिशन में तूलिका समेत कुल सात महिला पर्वतारोही थीं। अभियान की शुरुआत 21 जुलाई को ईरान में पर्वतारोहण में आने वाली दिक्कतों के संबंध में जानकारी (ऑल्टीट्यूड सिकनेस लेक्चर) के साथ हुई। यह 3965 मीटर ऊं ची तोचल पीक  जैसी चोटियों से होते हुए 30 जुलाई को पूरा हुआ। दल ने शीरपाला और पुलोर में तीन कैंपों के साथ चढ़ाई पूरी की। चढ़ाई के दौरान इस टीम को कभी तेज गर्म हवा तो कभी बर्फबारी, ग्लेशियर पिघलने के कारण फिसलन भरी चट्टानों और तापमान में अचानक भारी फेरबदल जैसी दुश्वारियों का सामना करना पड़ा।

तापमान अचानक 35 से माइनस फाइव

बकौल तूलिका, दामावंद की फतह काफी चुनौतीपूर्ण थी। वजह यह कि 35 डिग्री सेल्सियस से अचानक माइनस फाइव के तापमान में पहुंच जाना मौत को बुलावा देने जैसा था। यही नहीं, कई जगहों पर हवा की गति 50 किलो मीटर प्रतिघंटा थी। इससे सफर और मुश्किल हो रहा था। हमारे दल के कई पर्वतारोहियों को माउंटेन सिकनेस, सिरदर्द और उल्टियां भी हुईं।

एवरेस्ट के अनुभव ने दी मजबूती

तूलिका ने बताया, चूंकि मैं इससे पहले एवरेस्ट और वर्जिन पीक की चढ़ाई कर चुकी हूं। वहां के अनुभव ने हर पल दामावंद में मेरा साथ दिया। इसके बूते में मैंने इन चुनौतियों का बखूबी सामना किया। 27 जुलाई को पूर्वाह्न सवा 11 बजे मैं अपने दल के साथ दामावंद की चोटी पर थी। ज्वालामुखी होने के कारण यहां जगह-जगह सल्फर के फव्वारे फूट रहे थे। करीब 15 मिनट हम ऊपर रहे और फिर नीचे उतरने लगे।
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टीम से मिली प्रेरणा और यादें

तूलिका ने बताया, ब्रिटेन का केरन (13) जीवन में हमेशा याद रहेगा। पोलैंड निवासी 65 वर्षीय क्रिस्टोफ वेलेस्की सफर के दौरान हमें प्रेरणा देते रहे। यात्रा के दौरान यह मिथक भी टूट गया कि ईरान में महिलाओं की स्थिति बेहद खराब है। हमारे दल में ईरान की 5 लड़कियां थीं, ये सभी अच्छे परिवार से थीं।

वर्जिन पीक से मिला मौका

तूलिका को दामावंद पर रोहण का मौका हिमालय पर्वत शृंखला की वर्जिन पीक पर चढ़ाई के कारण मिला। अगस्त वर्ष-2014 में तूलिका ने ईरान माउंटेनियरिंग फेडरेशन के एक दल के साथ 6550 मीटर ऊंची वर्जिन पीक पर चढ़ाई की थी। उसी दौरान तूलिका को दामावंद के बारे में जानकारी मिली थी।

'अमर उजाला प्रबंधन का धन्यवाद। उनकी मदद से मेरा यह मिशन पूरा हो सका। जब मुझे इस क्लाइंबिंग के लिए बुलाया गया था, तो मेरे सामने पहली चुनौती आर्थिक संसाधन थे। इसका सारा खर्चा खुद उठाना था। उस वक्त अमर उजाला ने मेरा साथ दिया। जब मैं चोटी पर पहुंची तब भी मुझे अमर उजाला का सहयोग याद आया। ईरान में मैंने अपने देश का प्रतिनिधित्व किया। वहां पहुंचते ही मैंने अमर उजाला का ध्वज फहराकर प्रबंधन को धन्यवाद दिया। मेरठ का नाम रोशन किया इसका श्रेय अमर उजाला को जाता है। दूसरी कंपनियां भी सहयोग करें तो भारतीय युवा हर चोटी पर अपने कदम रख सकते हैं।'

- तूलिका रानी
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