सिगरेट के हर पैकेट पर लिखा होता है 'तम्बाकू पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।' बावजूद इसके लोग सिगरेट और दूसरे तरीकों से तम्बाकू का सेवन करने से नहीं मानते।
सरकार भी वैधानिक चेतावनी देकर अपने कर्तव्य से पल्ला झाड़ लेती है लेकिन कभी पूरी तरह से तम्बाकू उत्पादों को बंद करने के लिए पहल नहीं की गई।
इसका एक बड़ा कारण लाखों लोगों की रोजी-रोटी भी है। भारतीय अर्थव्यवस्था में तम्बाकू से जुड़ा व्यवसाय एक प्रमुख भूमिका निभाता आया है। विदेशी मुद्रा कमाने के मामले में यह चौथा बड़ा व्यवसाय है।
विश्व का छठा सबसे बड़ा तम्बाकू निर्यातक देश
भारत के कुछ राज्यों की ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था का तो आधार ही तम्बाकू की खेती है। एक रिपोर्ट के अनुसार तम्बाकू उत्पादन में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है।
2011 में भारत में 5 लाख, अस्सी हजार मीट्रिक टन तम्बाकू का उत्पादन किया गया था। आंकड़ों के मुताबिक देशभर में लगभग 20 लाख लोगों का जीवन तम्बाकू की खेती से जुड़ा हुआ है। इनमें कृषक से लेकर कारोबरी और दूसरे लोग भी शामिल हैं।
तम्बाकू के अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की हिस्सेदारी लगभग 5 प्रतिशत है और यह यह विश्व का छठा सबसे बड़ा तम्बाकू निर्यातक देश है। 1999-2000 वित्त वर्ष में भारत ने 5,000 करोड़ रुप का तम्बाकू का व्यापार किया था।
बिहार के समस्तीपुर जिले में तम्बाकू की खेती प्रमुख फसल के रूप में होती है। भगवतीपुर गांव के एक किसान अरुण कुमार ने अमर उजाला से बातचीत में
कहा 'गांव में लगभग 100 परिवार हैं जिसमें से लगभग 95 परिवारों के लोग तम्बाकू की खेती से जुड़े हुए हैं। आस-पास में भी अमूमन यही स्थिति है।
गेंहू, मटर से कई गुना फायदा
अरुण कुमार ने बताया लगभग 150 गज जमीन में मटर और गेहूं की खेती करने पर हमें 1500 से 16,00 रुपए का फायदा होता है। जबकि इतनी ही
जमीन में तम्बाकू की खेती करने पर 5,000 से 6,000 रुपए तक मिल जाते हैं। अरुण कुमार कहते हैं कि खेती करने वालों को तो इससे कोई नुकसान नहीं होता है लेकिन जो लोग इसका सेवन करते हैं उन्हें जरूर नुकसान होता है। यह जानते हुए भी अधिक मुनाफा पाने के लिए ज्यादातर लोग तम्बाकू की खेती करते हैं।
तम्बाकू बेचने के लिए गांव वालों को बाजार जाने की जरूरत नहीं होती है। व्यापारी खुद ही गांव में आकर इनसे माल खरीद लेते हैं। इन दिनों प्रति क्विंटल तम्बाकू की कीमत 18,000 से 20,000 रुपए है।