केंद्र व राज्य सरकारें चाहे जो दावा करें, मगर मिड डे मील की स्थिति पर पिछले महीने मानव संसाधन मंत्रालय को मिली पैसा रिपोर्ट बताती है कि योजना में सब कुछ ठीक नहीं है।
खासकर बिहार तथा उत्तर प्रदेश में योजना के क्रियान्वयन पर इस रिपोर्ट में कई गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।
मिड डे मील खाने से बिहार में मासूमों की मौत के बाद इस रिपोर्ट की सिफारिशों को अनदेखा किए जाने के लिए मानव संसाधन मंत्रालय भी कम जिम्मेदार नहीं है।
मिड डे मील योजना देश ही नहीं दुनिया की सबसे बड़ी स्कूलों में पुष्टाहार प्रदान करने वाली योजना है।
इस समय देश के 12.6 लाख सरकारी प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्कूलों में 12 करोड़ बच्चों को दोपहर का भोजन दिया जा रहा है।
बिहार में मिड डे मील खाने से 22 बच्चों की मौत की घटना ने इस योजना को दागदार कर दिया है।
उत्तर प्रदेश और बिहार में योजना के भौतिक सत्यापन पर आधारित जून 2013 में आई पैसा रिपोर्ट में योजना की कई खामियों पर सवाल खड़े किये गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार मिड डे मील योजना के तहत स्कूलों में सिर्फ 60 फीसदी बच्चों को भोजन मिल पा रहा है।
इस रिपोर्ट में निगरानी में कमी, शिकायतों के त्वरित निस्तारण की व्यवस्था न होने, योजना के लिए दिए जाने वाले खाद्यान्न में हेराफेरी इत्यादि का जिक्र किया गया था।
रिपोर्ट के अनुसार बिहार के स्कूलों में प्रतिदिन भोजन भी नहीं दिया जा रहा है। यही नहीं छात्रों को केंद्र द्वारा तय मात्रा से काफी कम भोजन दिया जाता है।
कमोबेश यही स्थिति उत्तर प्रदेश की भी है। शिकायत करने पर अधिकारी कोई कार्रवाई नहीं करते हैं। इस रिपोर्ट के मिलने के बाद भी केंद्र की ओर से अभी तक कोई कार्रवाई या जांच के आदेश नहीं दिये गये हैं।
स्कूलों में बच्चों को दोपहर में भोजन देने की शुरुआत हालांकि काफी साल पहले दक्षिण के राज्यों में शुरू की गई थी, मगर केंद्रीय स्तर पर 1995 में मिड डे मील योजना को कुछ चुनिंदा जिलों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया गया।
इस योजना के लिए पिछले साल केंद्र ने 10,867 करोड़ रुपये जारी किये थे, जबकि इस साल इस मद में 13,215 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया गया है।