कल अखबार देखकर मेरी माँ ने कहा, अगर शनि मंदिर में औरतों को जाने की इजाजत नहीं है, तो ना जाएँ। क्या फर्क पड़ता है? एक पल को मैंने भी सोचा, ठीक बात है, नुकसान तो मंदिर का ही है। मैंने खुद तय किया है, किसी ऐसी जगह नहीं जाऊँगी जहाँ औरतों को बराबर का दर्जा नहीं मिलता।
आधी आबादी बॉयकॉट करेगी, अपने आप अकल ठिकाने लग जायेगी। कुछ साल पहले तक मैं दिल्ली के निजामुद्दीन दरगाह जाती थी, लेकिन मजार पहुँचने से पहले मुझसे फूलों की टोकरी ले ली जाती, मजार को हाथ नहीं लगाने दिया जाता। मैं बाहर बैठी कव्वाली सुनती लेकिन मन में अंगारे भड़कते रहते। आखिर मन इतना खट्टा हो गया कि मैंने जाना ही छोड़ दिया। मुंबई में हाजी अली भी नहीं गयी। आखिर दरगाह जाने वालों को सूफी की मोहब्बत खींच लाती है। सूफी संतों की सबसे खास बात यह थी, वे भेद-भाव नहीं करते थे - न जात-पात, न मजहबी कट्टरपन।
मानने वालों में औरत और मर्द बराबर हुआ करते थे। ये औरतों से छुआ-छूत का चलन नया है। आज से पंद्रह-बीस साल पहले, जब मैं पहली बार हाजी अली और निजामुद्दीन के दरगाह गई, किसी ने मुझे रोका नहीं। और जब सूफी संत खुद जीते जी औरतों को दूर न रखते, किसी को क्या हक है हमें रोकने का? अक्सर खादिम मजार को अपनी जागीर समझते हैं, ठीक उसी तरह जैसे पंडित मंदिरों को अपना गढ़।
'मंदिर हो या दरगाह, इनका वजूद भक्तों से है'
मंदिर हो या दरगाह, इनका वजूद भक्तों से है, और उनके दिए चढ़ावे से - फूल, प्रसाद, खील, रोली, नारियल, चादर और पैसे। सबसे बड़ी बात - पैसे। तो मैंने भी ठान ली - एक कौड़ी न दूँगी।
अगर औरत की देह से इतनी तकलीफ है, तो इसी देह की मेहनत से कमाए पैसों पे क्यों हाथ मारने दूँ? इसी देह में पनपती है श्रद्धा, और गदर भी। लेकिन फिर मन में एक और बात आई - अगर ये लोग ('ये' लोग जो तय करते हैं, औरत को क्या आज्ञा है, कहाँ प्रवेश है, कहाँ नहीं) कल ये कह दें कि औरत का हर मंदिर में प्रवेश निषेध है, तो? अगर वो ये कहें, देव ही नहीं, देवी की मूरत को भी औरत छू नहीं सकती, तो? और किसी दिन अगर वो ये कह दें कि औरत का पढ़ना-लिखना धर्म के खिलाफ है, तो?
बहुत दूर की बात नहीं कह रही। औरत को क्या हासिल है, क्या मना है, ऐसे फरमान हर मजहब में जारी हुए हैं। जाति के नाम पर मर्दों पर भी हर तरह की पाबंदी लगायी गई। इतिहास और वर्तमान - गवाह है, मर्द-औरत-बच्चे सब पर धर्म और मजहब के नाम पर लोगों ने ऐसे सितम ढाए गए हैं कि सुन के रूह काँप जाती है। और जब भी परिवर्तन आया है, बहुत लड़ने के बाद ही आया है।
'ये मसला औरत और पाबंदियों का है'
ये मसला सिर्फ मंदिर-मस्जिद-दरगाह में प्रवेश का नहीं है। मसला औरत और श्मशान में दाह संस्कार, औरत और कब्रिस्तान, औरत और स्कूल -कॉलेज - व्यवसाय का भी है।
औरत की देह पर हर तरह की पाबन्दियाँ हैं - यहाँ मत जाओ; उसके साथ मत जाओ; मर्जी से शादी न करो; दोबारा शादी न करो; बच्चे पैदा करो; गर्भपात ना करो; सर अलावा शरीर के सारे बाल निकालो; दुबली-पतली रहो मगर इतनी भी दुबली नहीं के छाती चपटे तवे-सी लगे; टाँग छुपाओ; मुँह छुपाओ; सर ढक के रखो; माहवारी रहते रसोई में न जाओ; अचार न छुओ; बेवा हो तो दुल्हन को न छुओ; बेवा हो तो खाना फीका खाओ, साड़ी सफेद पहनो; जंग के मैदान में ना जाओ; गाड़ी ना चलाओ।
जो औरतें शनि मंदिर में और हाजी अली दरगाह में बराबर प्रवेश के हक के लिए लड़ रही हैं, शायद जानती हैं, पाबंदियों का कोई अंत नहीं ना ही कोई तर्क और अन्याय का एक ही जवाब है - संघर्ष।