देश में इस समय 16वीं लोक सभा के चुनावों के जरिये नई केंद्र सरकार चुनने की कवायद चल रही है। मौजूदा आर्थिक हालात में तमाम अर्थविद और बाजार विशेषज्ञ एक मजबूत समर्थन वाली स्थायी सरकार की जरूरत पर जोर दे रहे हैं क्योंकि देश को बड़े आर्थिक फैसलों की दरकार है।
लेकिन अगर हम करीब दो दशक पहले की बात करें तो बहुत कम संख्या वाली और कांग्रेस के बाहरी समर्थन वाली संयुक्त मोर्चा सरकार (1996-98) के समय कई अहम आर्थिक फैसले लिये गये।
इन फैसलों का देश की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी असर तो रहा ही है वहीं कई बड़े आर्थिक सुधारों का क्रेडिट भी उस सरकार के खाते में जाता है।
चिदंबरम ने की थी आय कर की दरों कमी
आय कर दरों में कटौती, राशन प्रणाली के तहत बीपीएल श्रेणी, तेल पूल घाटा को समाप्त करने के कदम, बीमा क्षेत्र में एफडीआई की कोशिश, काले धन को निकालने के लिए वीडीआईएस सहित तमाम बड़े फैसले संयुक्त मोर्चा की उस कमजोर सरकार ने लिये थे जिसमें करीब दो साल में एच.डी. देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल दो प्रधानमंत्री रहे।
वहीं यूपीए दो की सरकार जो कांग्रेस के संख्या बल के हिसाब से यूपीए एक से मजबूत मानी जाती थी, उस पर नीतिगत जड़ता का आरोप लगा है।
इन फैसलों में देश के मध्य वर्ग और नौकरीपेशा लोगों का सबसे पसंदीदा वह फैसला भी जिसमें आय कर की दरों कमी कर आयकर की उच्चतम दर को 30 फीसदी कर दिया गया था। संयुक्त मोर्चा सरकार में पहली बार वित्त मंत्री बने पी. चिदंबरम के 1997-98 के ड्रीम बजट में यह फैसला लिया गया था।
काले धन के लिए संयुक्त मोर्चा लाया था वीडीआईएस
इसके साथ ही काले धन की वापसी को लेकर पिछले कई साल से बहस जोरों पर है और हर बड़ी पार्टी काले धन को लाने का दावा कर रही है। सरकार ने काले धन के आकलन के लिए समितियां भी बनाई और इनकी रिपोर्ट सरकार को मिल चुकी है।
लेकिन पहली बार संयुक्त मोर्चा सरकार के समय ही वालंटियरी डिस्कलोजर ऑफ इनकम स्कीम (वीडीआईएस) लाई गई थी और जिसमें कर चुकाकर काले धन को सफेद करने का मौका दिया गया था।
ज़हां तक पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों की बात है तो उन पर सब्सिडी का फैसला हमेशा राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है। लेकिन दिलचस्प बात है कि संयुक्त मोर्चा सरकार के दौरान पेट्रोलियम सब्सिडी के लिए ऑयल पूल घाटा शब्द का इस्तेमाल किया जाता था।
पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को बाजार से जोड़ा
उस समय वाम दलों के समर्थन से चल रही सरकार ने वाम दलों के समर्थन से ही इसका हल निकाला और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत में की गई एक आम सहमति वाली बढ़ोतरी के जरिये ऑयल पूल घाटा निर्धारित समय से पहले ही पूरा हो गया था।
उसके बाद ही पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को बाजार से जोडऩे का कैबिनेट ने फैसला लिया था।
वहीं वित्तीय सुधारों में शुमार होने वाले बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति की पहली कोशिश भी संयुक्त मोर्चा सरकार के समय में की गई थी हालांकि वाम दलों और भाजपा के विरोध के चलते इस संबंध में लाये गये विधेयक को वित्त मंत्री पी. चिदंबरम को वापस लेना पड़ा था।
संयुक्त मोर्चा ने पीडीएस का पुनर्गठन किया
इसी तरह देश में आम नागरिक को खाद्य सुरक्षा के लिए सस्ती कीमत पर खाद्यान्न देने का कदम भी संयुक्त मोर्चा सरकार के समय में ही उठाया गया था। उसी समय सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली का पुनर्गठन कर लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) लागू की थी।
इसी के तहत गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) और गरीबी रेखा से ऊपर (एपीएल) श्रेणियों में लाभार्थियों को बांटा गया और बीपीएल के लिए दाम खाद्यन्नों की आर्थिक लागत से आधा किया गया।
इनके अलावा गैर यूरिया उर्वरकों के लिए दोबारा सब्सिडी शुरू करने और चीनी के निर्यात को डी कैनालाइज करने व आवश्यक वस्तु अधिनियम से बड़ी संख्या में उत्पादों को बाहर करने का फैसला भी इसी सरकार ने लिया था।