पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम मेक इन इंडिया अभियान को लेकर थोड़ा सचेत थे। उनका मानना था कि यह अभियान बहुत महत्वाकांक्षी है लेकिन देखना होगा कि भारत दुनिया में कम कीमत और अहमियत के सामान बनाने का कारखाना न बन जाए।
डिजिटल इंडिया को लेकर भी वह काफी आशान्वित थे। पूर्व राष्ट्रपति ने अपनी अंतिम किताब ‘एडवांटेज इंडिया : फ्रॉम चैलेंज टू अपॉर्च्यूनिटी’ में देश के विकास को लेकर कई विचार रखे हैं। यह किताब जल्द ही बाजार में आने वाली है।
पूर्व राष्ट्रपति की अंतिम किताब
इस किताब के मुताबिक कलाम सरकार की इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी चिंताओं से सहमत थे। उनका कहना था कि देश ने असंतुलित ढांचागत विकास देखा है।
एक तरफ टेलीकॉम और इंटरनेट सेक्टर में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, जबकि कई गांव अब भी सड़क तथा बिजली से नहीं जुड़े हैं। औद्योगिक विकास के लिए ढांचागत विकास की अनदेखी नहीं कर सकते।
उनका सुझाव था कि हमें युवाओं के विचारों, बड़े लोगों के ज्ञान तथा लोकतंत्र की ताकत से मौलिक निर्माण करने की जरूरत है। कलाम को लगता था कि राजनीति म्यूजिकल चेयर का खेल है, जहां एक ही नेता या उनके चाहने वाले सत्ता प्राप्त करते हैं। हालांकि उन्हें राजनीति में सुधार होने की उम्मीद थी।
अग्नि का परीक्षण टालने के लिए था दबाव
किताब में दावा किया गया है कि भारत पर अग्नि मिसाइल का परीक्षण टालने के लिए अमेरिका और नाटो का भारी दबाव था। इसमें पूर्व राष्ट्रपति के हवाले से लिखा गया है कि 1989 में अग्नि मिसाइल के परीक्षण से कुछ ही घंटे पहले कलाम के पास तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कैबिनेट सचिव टीएन शेषन की हॉटलाइन कॉल आई।
शेषन ने कलाम को बताया कि अमेरिका और नाटो किसी भी मिसाइल का परीक्षण टालने के लिए दबाव बना रहे हैं। इस समय अग्नि की स्थिति क्या है। कलाम ने कुछ क्षणों तक सोचा और जवाब दिया कि अब परीक्षण टाला नहीं जा सकता है। बहुत देर हो गई है।
कलाम के मुताबिक यह जवाब देते समय उनके दिमाग में वे संघर्ष घूम रहे थे, जो उन्होंने और उनकी टीम ने किए थे। उनके सामने वह रिपोर्ट भी चिंता का विषय थी, जिसके अनुसार कुछ दिनों बाद चांदीपुर में मौसम खराब हो सकता था। खैर, शेषन ने हां कह दी और 22 मई 1989 को अग्नि का परीक्षण हुआ।