करीब 40 बरस पहले सिनेमाई पर्दे पर एक नए चेहरे का आगाज हुआ, जिसके सफर के बारे में ज्यादा लोगों को अंदाजा नहीं था। गोल चेहरा, बड़ी आंखें और आकर्षक अंदाज, कुछ ही दिनों में साफ हो गया कि यह चेहरा इतनी जल्दी जाएगा नहीं। दक्षिण भारतीय फिल्मों को एक नई अदाकारा मिल गईं, जिनके लिए करीब बीस साल सिर्फ और सिर्फ एक शब्द का इस्तेमाल हुआ - हीरोइन।
तमिल, तेलुगू, कन्नड़ जैसी भाषाओं की 140 से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाली इस अदाकारा ने एक हिंदी फिल्म में भी अभिनय का जोर दिखाया। हमसे कोई गलती नहीं हो रही, हम यहां सियासत की बात ही कर रहे हैं। यहां जिक्र हो रहा है 'पुरात्ची थलाइवी' का, जिन्हें उनके चाहने वाले अब अम्मा कहकर पुकारते हैं। जयललिता जयाराम ने भले सिनेमा को छोड़कर सियासत का दामन थामा हो, लेकिन कामयाबी ने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा।
सिनेमा में कामयाबी की इबारत लिखने के बाद उन्होंने राजनीति की कूची उठाई और एक बार फिर सफलता की रेखाएं खींच दीं। तमिलनाडु में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठीं जयललिता इससे पहले 1991 से 1996 के बीच, फिर कुछ वक्त 2001 में और उसके बाद 2002 से 2006 के बीच यही जिम्मा संभाल चुकी हैं। समर्थकों के लिए वह अम्मा भी हैं और क्रांतिकारी नेता (पुरात्ची थलाइवी) भी।
15 साल की उम्र से शुरू किया फिल्मों में काम
जयललिता जब 15 बरस की थीं, तो उनकी मां ने उन्हें फिल्मों में काम कराना शुरू किया। वह उस वक्त स्कूल में थीं। निर्माताओं के सामने शर्त यह रखी गई कि शूटिंग केवल गर्मियों की छुट्टी में होगी और वह अपनी क्लास नहीं मिस करेंगी। उनकी पहली फिल्म अंग्रेजी में थी, जो 1961 में आई। जब सिनेमा जगत में जयललिता ने पर्याप्त हाथ दिखा लिए, उसके बाद सियासत में उतरने की ठानी और मदद मिली एक दिग्गज नेता से।
1977 से सीएम के पद पर बैठे एम जी रामचंद्रन ने हाथ पकड़कर उन्हें सियासत के समंदर में उतारा, हालांकि वो इससे आज भी इनकार करती हैं। जयललिता की अच्छी अंग्रेजी का फायदा उठाते हुए रामचंद्रन ने उन्हें राज्यसभा में भिजवाया था। पार्टी की कमान जयललिता के हाथों में कैसे आई, इसकी कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। जब जयललिता का कद पार्टी के भीतर धीरे-धीरे बढ़ रहा था, तभी एक ऐतिहासिक मोड़ आया।
1984 में जब रामचंद्रन को स्ट्रोक पड़ा, तो जयललिता ने इस आधार पर मुख्यमंत्री या पार्टी में शीर्ष पद लेने की कोशिश की कि वो खराब सेहत की वजह से अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से नहीं उठा पाएंगे। इसी साल उन्होंने आम चुनावों में अगुवाई की और कामयाब साबित हुईं। यह वो दौर था, जब उनकी पार्टी और कांग्रेस के बीच खूब छन रही थी।
रामचंद्रन का निधन, जयललिता को कमान
रामचंद्रन 1987 में दुनिया से रुखसत हो गए और पार्टी दोफाड़ हो गई। एक धड़ा रामचंद्रन की विधवा जानकी के पक्ष में आ गया, दूजा जयललिता के पाले में चला गया। हालांकि, इसके बावजूद जयललिता ने रामचंद्रन से मिले सभी सबक अमल में लाते हुए सीढ़ी दर सीढ़ी अपने लिए जगह बनानी और बढ़ानी शुरू की।
राजनीति में उनका सफर इसी उठापटक के साथ 2001 तक जारी रहा, जब उन्हें एक और झटका लगा। आपराधिक धाराओं के तहत दोषी पाए जाने के बाद उन्हें चुनावों में खड़ा नहीं होने दिया गया, लेकिन इसके बावजूद जीत ने उनके कदम चूमे। करीब दस साल बाद एक बार फिर 2011 में एआईडीएमके ने 13 दलों की गठबंधन के अगुवा के रूप में भूमिका निभाई और एक बार फिर कुर्सी मिली। इसके कुछ दिनों बाद उन्होंने एक चौंकाने वाला फैसला किया, जिसके गहरे राजनीतिक मायने थे।
जयललिता ने अरसे से अपनी सहयोगी शशिकला नटराजन और 13 अन्य को पार्टी से बाहर का दरवाजा दिखा दिया। तहलका पत्रिका ने दावा किया कि शशिकला और उनके कुछ रिश्तेदार खाने में जहर मिलाकर जयललिता की हत्या करने की कोशिश कर रहे थे। हालांकि, मार्च में यह मामला फिर उलट गया। शशिकला को लिखित माफी मांगने के बाद पार्टी में दोबारा शामिल कर लिया गया।
केंद्रीय राजनीति के लिए अहम हुईं अम्मा
जयललिता का यह सफर तमिलनाडु तक था। अब बात इससे बाहर के दायरे की। केंद्रीय राजनीति में सरकार कांग्रेस की बने या भाजपा की, जयललिता हमेशा अहम साबित होती हैं। वह एनडीए के साथ रह चुकी हैं और उससे दूरी भी बना चुकी हैं। 2014 के चुनावों की सरगर्मियां तेज होते ही यह खबर उड़ी कि जयललिता और भाजपा के पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के बीच गहरी दोस्ती है, जिसका असर भी दिखेगा। नरेंद्र मोदी ने गुजरात में जब लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की, तो उनके शपथ ग्रहण समारोह में जयललिता खुद पहुंची थी।
मोदी की दावेदारी पर तलवारें खिंच रही थीं और भगवा दल की उम्मीदें बढ़ रही थी कि दक्षिण भारत में कोई और साथ दे, न दे लेकिन जयललिता मोदी के नाम पर कभी पीठ नहीं दिखा सकती। लेकिन जयललिता ने वो किया, जिससे भाजपा और मोदी दोनों हैरत में पड़ गए।
एआईडीएमके की एक अहम बैठक में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि वह अपनी नेता जयललिता को प्रधानमंत्री के पद पर देखना चाहती है। जाहिर है, यह मोदी के लिए तगड़ा झटका था। लेकिन जयललिता फैसला कर चुकी थीं। कहानी यहीं तक सीमित नहीं रही। कुछ ही दिनों में वह सीपीएम से जा मिलीं और तीसरे मोर्चे को मजबूत बनाने की बात कह डाली। तीसरा मोर्चा और मोदी के बीच छत्तीस का आंकड़ा है, यह बताने की जरूरत नहीं।
मोदी को झटका, खुद बनना चाहती हैं पीएम
हालांकि, राजनीतिक जानकारों का एक धड़ा यह भी मानता है कि चुनावों के बाद जयललिता अपने फैसले में बदलाव भी कर सकती हैं। मोदी को उम्मीद है कि वह चुनावों के बाद उनका मन बदलेगा। लेकिन जब से उन्होंने लोकसभा चुनावों के लिए वाम दलों से हाथ मिलाया, मोदी से उनके रिश्ते में वो पुरानी बात नहीं रही। बहरहाल, वाम दल भी फिर संभलकर कदम रख रहे हैं।
जब प्रकाश कारत से पूछा गया कि उनका पीएम पद का दावेदार कौन होगा, तो उन्होंने जवाब दिया, "अभी इस बारे में फैसला करने का वक्त नहीं आया। चुनावों के बाद इस पर निर्णय होगा।" हालांकि, यह बात उन्हें भी बखूबी मालूम है कि कुर्सी का सवाल उठने पर राजनीतिक दलों का यह गठबंधन पल भर में बिखर सकता है।
तमिलनाडु और पुडुचेरी की सभी लोकसभा सीटों पर जीत के साथ पीएम बनने का ख्वाब देख रही जयललिता की कहानी इन चुनावों में और दिलचस्प हो गई है। कारण मोदी हैं। अब यह देखना मजेदार साबित होगा कि वह भाजपा के 272 से कुछ दूरी पर ठहरने के बाद मोदी को पीएम बनाने के लिए मदद देती हैं या फिर खुद पीएम बनने की ताल ठोकती हैं। अम्मा क्या रंग दिखाएंगी, अंदाजा लगाना तक मुश्किल है। सो देखते जाइए!