प्रथम विश्व युद्ध के १०० वर्ष पूरे होने के मौके पर प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. इरफान हबीब से अमर उजाला ने एक खास बातचीत की।
इसमें यह जानने की कोशिश की कि उस समय हुई इस अभूतपूर्व घटना ने विश्व राजनीति को किस प्रकार आकार दिया और कितना प्रभावित किया। साथ ही भारत के राष्ट्रीय आंदोलन पर क्या प्रभाव डाला? भारत के संदर्भ में उसकी क्या भूमिका रही?
सर प्रथम विश्व युद्ध ने इतिहास को किस प्रकार शेप दिया।
ऐसा है कि १९१४ के युद्ध से पहले यह आम ख्याल हो गया था कि लड़ाई होने वाली है। यह तो उस वक्त नहीं मालूम था कि आस्ट्रिया के ड्यूक को मार दिया गया था। इस वजह से शुरू होगी।
आस्ट्रिया सर्बिया की लड़ाई से शुरू होगी। लेकिन यह सभी का मानना था कि जो बड़े बड़े शक्तिशाली मुल्क हैं, इग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी आदि लड़ाई की तैयारी कर रहे थे। और यह लड़ाई इसलिए हो रही है कि इन बड़े देशों के जो उपनिवेश थे उनका बंटबारा हुआ तो इंग्लैंड और फ्रांस को बड़ा हिस्सा मिला।
जर्मनी को कुछ नहीं मिला। छोटे-छोटे एक दो मुल्क ही उनके पास थे। इसलिए उनकी महत्वाकांक्षाएं बढ़ गईं कि वो इंग्लैंड और फ्रांस को हरा कर इन मुल्कों पर कब्जा करें। इसी के साथ इंग्लैंड और फ्रांस जर्मनी की बढ़ रही औद्योगिक शक्ति को सीमित करना चाहते थे।
जर्मनी इंग्लैंड और फ्रांस को धक्का पहुंचाना चाहता था। बल्कि १९०१ में हाबसन ने किताब लिखी थी जिसमें ऐसी लड़ाई के खतरे की बात कही थी। उसके बाद कई, खास तौर से सोशलिस्ट पार्टी थीं जिन्होंने इसकी ओर इशारा किया।
यह लड़ाई पिछली लड़ाई से कैसे अलग थी?
जब इतनी बड़ी लड़ाई हुई तो यह दो बहुत बड़े पक्षों में हुई। सबसे पहले अंग्रेजों ने टैंक बनाए लेकिन उनकी गिनती बहुत कम थी। इसी तरह हवाई जहाज बहुत विकसित नहीं थे। एक और युद्द में नई चीज हुई कि टे्रंच(खाई) खोदी गई।
खोद के शूट डाउन करना होता था। पिछली लड़ाई में जहां हजारों मारे जाते थे वहीं इस वार में लाखों मारे गए। हालांकि दूसरे विश्व युद्ध में इससे ज्यादा मारे गए थे। फिर बमबारी शुरू हुई। जर्मन हवाई जहाजों ने बमबारी की। इस तरह लड़ाई के नए फीचर आए।
इस लड़ाई के परिणाम क्या रहे?
जाहिर तौर पर इंग्लैंड, फ्रांस और अमेरिका सफल रहे। रूस १९१७ की क्रांति के बाद बाहर चला गया। और उसके बड़े ऐरिया पर जर्मनी का कब्जा हो गया था लेकिन वह हार गया था।
जाहिर था कि अब जर्मनी, आस्ट्रिया और तुर्की हार गए हैं और इनकी टेरेटरी दूसरे मुल्कों को बांट दी गई। जर्मनी और आस्ट्रिया छोटे मुल्क हो गए। तुर्की की टेरेटरी, बांट दी गई। तुर्की को बांट कर सऊदी अरब, शाम, फलस्तीन, इराक बना दिए गए।
यह मालूम हुआ कि तुर्की बिल्कुल निजाम हैदराबाद की तरह बन जाएगा। लेकिन दो चीजें नयी हुईं। एक सोवियत क्रांति, जिसका असर यूरोप के लोगों पर बहुत पड़ा। जर्मनी में भी १९१८ में सोशलिस्ट इंकलाब हुआ और इस तरह जो समाजवादी विचारधारा मजबूत हुई।
दूसरे राष्ट्रीय आंदोलन मजबूत हुआ। तुर्की को यह लोग दबा कर रखना चाहते थे। मगर कमाल अता उर सामने आए। उन्हें रूस की भी मदद मिली। हिंदुस्तान में भी १९२० में खिलाफत और नान कोपरेशन आंदोलन चला और इसकी वजह से अंग्रेज हिंदुस्तानी सिपाही तुर्की नहीं भेज सके।
मुसलमान समझते थे या उन्हें समझाया गया था तुर्की का खलीफा इस्लाम के लिए जरूरी है। मगर बाकी लोग भी जिन्हें खिलाफत आंदोलन से मतलब नहीं था, वह भी समझते थे कि अगर तुर्की की आजादी खत्म हो जाती है तो ऐशिया में अंग्रेज और फ्रांस का मुकाबला करने वाला कोई नहीं है।
इसलिए एक तरफ से सोवियत रूस की मदद और दूसरे हिंदुस्तान में खिलाफत आंदोलन, दोनों ने तुर्की की मदद की। इस तरह नतीजा यह हुआ कि उपनिवेशवाद को जहां मजबूत होना चाहिए था, ऐसा न होकर उसकी बुनियाद कमजोर हुई।
भारत के संदर्भ में बात करें तो उसके लिए यह लड़ाई फायदेमंद रही या नुकसानदेह?
भारत को यह तो नुकसान हुआ ऐसी लड़ाई में जिससे हमारा कोई लेना देना नहीं था। जिससे हमें फायदा नहीं था उसमें हमारे बहुत लोग मारे गए। फ्रांस और बेल्जियम के मैदानों में भारत के सिपाही शहीद हुए।
१९१५ में सिंगापुर में पंजाब फोर्थ इंफेंटरी के ४४ जवानों को शूट किया गया। इससे अंग्रेजों के खिलाफ बगावत हुई। कहा गया हम क्यों लड़ाई में जाएं? हम तो हिंदुस्तान की आजादी के लिए लड़ेंगे।
गदर तहरीक शुरू हुई। गदर तहरीक वाले न सिर्फ सिंगापुर में बल्कि हिंदुस्तान में भी शहीद हुए। आजकल बहुत कम लोग जानते हैं कि पंजाब में ५०० लोग शहीद हुए। इससे फिर हिंदुस्तान की कौमी तहरीक को फायदा हुआ। हिंदु सिख मुसलमान सभी शामिल हुए।
इसके अलावा लड़ाई के जमाने में राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े नेता कहते तो थे कि इस लड़ाई में हम अंग्रेजों के साथ हैं। लेकिन अंग्रेज से पूछते थे कि आप अपने युद्ध के उद्देश्य (वार एम्स) बताएं। आप इस लड़ाई में क्यों शामिल हैं? आप जो आजादी की बात कहते हैं वह हिंदुस्तान में लागू होगी या नहीं?
आप जो कहते हैं कि हम बेल्जियम की आजादी के लिए लड़ रहे हैं। जर्मनी ने बेल्जियम पर हमला किया था क्योंकि वह इसी रास्ते से फ्रांस पर हमला कर सकता था। तो इसी लड़ाई के दौरान दो बहुत बड़ी चीजें हुई। १९१६ में लखनऊ में कांग्रेस और मुसलिम लीग के बीच पैक्ट हुआ।
कांग्रेस ने यह कहा कि हम सेपरेट इलेक्टरेट की मुसलिम लीग के स्टैंड को स्वीकार करते हैं। वहीं मुसलिम लीग ने भी होम रूल लीग की मांग की, स्वराज्य की मांग की। कहा कि हम इसके लिए कांग्रेस के साथ हैं। तो इस तरह दोनों ने अपनी पोजीशन बदली। इससे पहले मुसलिम लीग कहती थी कि हम अंग्रेजों के साथ हैं।
यह बहुत मशहूर पैक्ट था जो लड़ाई के बीच हुआ। दो होम रूल लीग शुरू हुईं। एक बाल गंगाधर तिलक ने शुरू की और दूसरी एनी बेसेंट ने। दोनों में आपस में कुछ मतभेद था लेकिन दोनों का लक्ष्य एक था। जब अंग्रेजों ने एनी बेसेंट को गिरफ्तार किया तो उसका भारत में बहुत जबरदस्त विरोध हुआ।
लोग सडक़ों पर उतर आए। ऐसा विरोध पहले कभी देखने को नहीं मिला था। इससे जाहिर हो गया कि अंग्रेज साम्राज्य लोकतंत्र और आजदी की बात केवल यूरोप के लिए कर रहा है उसका भारत से कोई लेना देना नहीं है।
भविष्य में युद्धों की क्या संभावनाएं देखते हैं?
इससे दो सबक लेने चाहिए। युद्द जितना कम हों उतना अच्छा। दूसरा यह कि विश्व में आजादी की लड़ाई आज भी चल रही है इसलिए जरूरी है कि लोगों में एकता हो।
धर्म और कौम के नाम पर नहीं लड़े। अगर भारत के लोग १९२० में कौम के नाम पर अलग हो गए होते तो आजादी नहीं मिलती। जब कौम के नाम पर अलग हुए तो आजादी तो मिली लेकिन विभाजन हो गया।