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हिटलर से पहले था स्वास्तिक से प्यार

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पश्चिम में स्वास्तिक को फ़ासीवाद से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन हज़ारों सालों से इसे सौभाग्य के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है।
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लेकिन नाज़ियों के आने से पहले के यूरोप के इतिहास की बातें अब सामने आ रही हैं और इसके साथ ही ये सवाल भी पूछा जाने लगा है कि क्या ये प्राचीन प्रतीक अपने साथ जुड़ी नकारात्मक बातों से कभी मुक्त हो पाएगा।

संस्कृत में स्वास्तिक का मतलब 'सौभाग्य' से होता है। हज़ारों सालों से इस प्रतीक चिह्न का इस्तेमाल हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म के मानने वाले लोग करते रहे हैं और यह माना जाता रहा है कि स्वास्तिक एक भारतीय प्रतीक है।
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पश्चिम से एशिया की यात्रा करने वाले लोग इसकी सकारात्मकता से प्रभावित हुए और वापस लौटकर उन्होंने इसका इस्तेमाल शुरू कर दिया। 20वीं सदीं की शुरुआत तक इसकी लोकप्रियता सनक की हद तक बढ़ गई थी।

कोकाकोला पर भी स्वास्तिक!

अमरीका के स्टीवन हेलर ने ग्राफ़िक डिज़ाइन पर 'द स्वास्तिकः सिम्बल बियॉन्ड रिडेम्पशन' नाम से एक किताब लिख चुके हैं। उन्होंने अपनी किताब में इस बात पर रोशनी डाली है कि पश्चिम में वास्तुकला, विज्ञापन और उत्पादों के डिज़ाइनों में स्वास्तिक को किस तरह से अपनाया गया है।

वे कहते हैं, "कोका कोला ने इसका इस्तेमाल किया। कार्ल्ज़बैर्ग बियर की बोतलों पर इसे लगाया। 'द ब्वॉय स्काउट्स' ने इसे अपनाया और 'गर्ल्स क्लब ऑफ़ अमरीका' ने अपनी मैगज़ीन का नाम स्वास्तिक रखा। यहां तक कि उन्होंने अपने नौजवान पाठकों को इनाम के तौर पर स्वास्तिक चिह्न भेंट किए।"

अमरीकी सेना ने पहले विश्व युद्ध में इस प्रतीक चिह्न का इस्तेमाल किया। ब्रितानी वायु सेना के लड़ाकू विमानों पर इस चिह्न का इस्तेमाल 1939 तक होता रहा था। लेकिन 1930 तक इसकी लोकप्रियता में उस वक़्त एक ठहराव आ गया जब जर्मनी की सत्ता में नाज़ियों का उदय हुआ।

इसके पीछे भी एक कहानी है। 19वीं सदी में कुछ जर्मन विद्वान भारतीय साहित्य का अध्ययन कर रहे थे तो उन्होंने पाया कि जर्मन भाषा और संस्कृत में कई समानताएँ हैं।

भारतीयों और जर्मनों के पूर्वज एक नहीं थे?

उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीयों और जर्मन लोगों के पूर्वज एक ही रहे होंगे और उन्होंने देवताओं जैसे वीर आर्यन नस्ल की परिकल्पना की। इसे यहूदी विरोधी कुछ समूहों ने लपक लिया और स्वास्तिक का आर्यन प्रतीक के तौर पर चलन शुरू हो गया।

देखते ही देखते इसने नाज़ियों के लाल रंग वाले झंडे में जगह ले ली और 20वीं सदी के अंत तक इसे नफ़रत की नज़र से देखा जाने लगा। नाज़ियों द्वारा कराए गए यहूदियों के नरसंहार में बचे 93 साल के फ़्रेडी नॉलर कहते हैं, "यहूदी लोगों के लिए स्वास्तिक भय और दमन का प्रतीक बन गया था। "

युद्ध ख़त्म होने के बाद जर्मनी में इस प्रतीक चिह्न पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और 2007 में जर्मनी ने यूरोप भर में इस पर प्रतिबंध लगवाने की नाकाम पहल की थी।

इसे विडंबना ही कहा जा सकता कि स्वास्तिक के चिह्न की जड़ें यूरोप में कहीं गहरी हैं। पुरातत्वविदों ने यह पाया है कि इसका संबंध केवल भारत से नहीं था। प्राचीन ग्रीस के लोग इसका इस्तेमाल करते थे। पश्चिमी यूरोप में बाल्टिक से बाल्कन तक इसका इस्तेमाल देखा गया है।
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'हिटलर ने किया खराब इस्तेमाल'

यहां तक कि यूक्रेन के नेशनल म्यूज़ियम में कई तरह के स्वास्तिक चिह्न देखे जा सकते हैं जो 15 हज़ार साल तक पुराने हैं। कुछ लोग ये सोचते हैं कि यूरोप में इस प्रतीक चिह्न का सकारात्मक इस्तेमाल फिर से शुरू हो सकता है।

कोपनहेगन में पिछले साल 13 नवंबर को 'स्वास्तिक डे' के तौर पर मनाया गया। इस मौक़े पर दुनिया भर के टैटू कलाकार इकट्ठा हुए। उन्होंने मुफ़्त में स्वास्तिक का चिह्न बनाने की पेशकश भी की। उनकी कोशिश अपने विविधतापूर्ण सांस्कृतिक अतीत को लेकर लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने की थी।

कोपनहेगन में ही टैटू पार्लर चलाने वाले पीटर मैडसेन कहते हैं, "स्वास्तिक प्रेम का प्रतीक था लेकिन हिटलर ने इसका ख़राब इस्तेमाल किया। अगर हम लोगों को स्वास्तिक का वास्तविक अर्थ समझा पाएं तो हम फ़ासीवादियों से इसे छीन सकते हैं।"

लेकिन फ़्रेडी नॉलर जैसे लोग जिन्होंने फ़ासीवाद का दंश झेला है, उनके लिए स्वास्तिक से प्यार करना सीखना आसान काम नहीं होगा।
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