सुप्रीम कोर्ट ने 16 दिसंबर की रात चलती बस में युवती से गैंगरेप की वारदात को मौजूदा समय की सबसे वीभत्स घटना बताया है। मणिपुर में फर्जी मुठभेड़ के संबंध में दायर याचिका की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इस खौफनाक वारदात के अभियुक्तों पर देश के कानून के मुताबिक मुकदमा चलेगा।
जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की पीठ ने कहा कि इस जघन्य अपराध के अभियुक्तों को सरेआम फांसी पर नहीं लटकाया जा सकता। इस देश में जब तक सुप्रीम कोर्ट है और कानून का राज कायम है, ऐसे अभियुक्तों को गोली से नहीं उड़ाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रतिक्रिया उस समय व्यक्त की जब मणिपुर सरकार ने कथित फर्जी मुठभेड़ को लेकर अदालत में याचिका दायर करने वालों को देशद्रोही कहा तथा मुठभेड़ों को जायज ठहराने की कोशिश की।
पीठ ने राज्य सरकार के कथन पर गहरी आपत्ति जताते हुए राज्य सरकार से कहा कि आप बिना किसी सबूत के याचिकाकर्ताओं को राष्ट्रविरोधी कैसे कह सकते हैं। राष्ट्रीयता पर सरकार का एकाधिकार नहीं है। सरकार किसी को यूं ही राष्ट्रविरोधी नहीं कह सकती। सत्ता पर काबिज होने का मतलब यह नहीं कि किसी को भी देशद्रोही कह दिया जाए। याचिका दायर करने वालों पर उंगली उठाना ठीक नहीं है। अदालत आम आदमी और सैनिकों के मारे जाने पर भी उतना ही अफसोस व्यक्त करती है।
वहीं फर्जी मुठभेड़ में मारे गए एक किशोर को याचिकाकर्ता की ओर से जुवेनाइल कहे जाने पर अदालत ने ऐतराज जताया। पीठ ने कहा कि उसे जुवेनाइल कहना ठीक नहीं है। वह भी एक व्यक्ति है। अदालत ने कहा कि देश के एक प्रधानमंत्री और एक पूर्व प्रधानमंत्री आतंकवाद का शिकार हुए। लेकिन उनके हत्यारों को भी कानून के दायरे में रहकर सजा दी गई। उन्हें भीड़ के हवाले नहीं किया गया।
गौरतलब है कि गैंगरेप को अंजाम देने वाले दरिंदों के खिलाफ उभरे जन आक्रोश के चलते कई बार गुनहगारों को सार्वजनिक रूप से फांसी लगाने की मांग हो रही है।