महाराष्ट्र में डांस बार के फिर से खुलने की संभावना हैं। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि बार (यानी शराबघर) में डांस पर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती है। कोर्ट ने माना है कि डांसरों को बार में काम करने का हक है, लेकिन साथ में ये चेतावनी भी दी है कि डांस में किसी प्रकार की अश्लीलता ना हो।
विज्ञापन
लेकिन ‘अश्लीलता’ क्या है? इसकी कानून में कोई परिभाषा तय नहीं है। जैसे ‘लाज’ या ‘इज्जत’ या ‘सुशीलता’ की कोई कानूनी परिभाषा नहीं। किसी को मटकना अश्लील लगता है तो किसी को आँख का इशारा। किसी को स्तन से तकलीफ है तो किसी को टाँग से। किसी को लडकियों का जींस पहनना अश्लील लगता है और किसी को लडकों का चूमना।
संस्कृति और अश्लीलता की लाठी का सहारा लेकर न जाने कितनी बार औरतों पर हमला हुआ है। कुछ लोग, जिन्हें ना जनता ने वोट दिया है और ना ही किसी ने हिन्दुस्तानी संस्कृति का ठेका उनके हवाले किया है, पिछले कुछ सालों से मंगलुरु जैसे शहरों में क्लब और बार में लडकियों को ढूँढ-ढूँढकर मारते हैं।
विज्ञापन
और एक वो समय था
कुछ पुलिस वाले सारे कानूनों को तोडते हुए मीडिया समेत मेरठ के पार्क में
पहुँच जाते हैं और युवक-युवतियों को 'अश्लीलता' फैलाने के नाम पर मारा-पीटा
जाता है। अब महाराष्ट्र सरकार ये कहती है कि औरतों का बार में नाचना
संस्कृति के खिलाफ है। जबकि सब जानते हैं कि हमारी संस्कृति में औरतों का
नाचना तो शामिल है ही साथ ही साथ शराब, भांग और चरस भी शामिल है।
हिन्दुस्तान में हजारों तरह की संस्कृतियाँ एक साथ जीवित हैं। यहाँ मंदिरों
में संभोग के दृश्य तराशे गए। इसी देश में लडकियाँ सार्वजनिक नाच में भाग
लेती हैं, खुद भी शराब पीती हैं और अपने पसंद का साथी चुनती हैं। भारत के
अंडमान द्वीप पर कुछ लोग निर्वस्त्र भी रहते हैं और खुद को अश्लील नहीं
समझते।
एक समय था जब देश के कई हिस्सों में औरतें ब्लाउज नहीं पहनती थीं।
बल्कि पिछली सदी में कुछ औरतों ने अपनी स्मृति रचनाओं में लिखा भी है कि
नानी के जमाने में कोई युवती ब्लाउज पहन ले तो उसको अश्लील कह के डाँटा
जाता था! छुप-छुप के ब्लाउज पहनती थी, रात को, सिर्फ पति को दिखाने के लिए!
सदियों से नाच-गाने का प्रदर्शन हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है।
बार डांस के बहाने न हो शोषण
कभी
मंदिर में हुआ करता था फिर महल-हवेली में हुआ। उसके बाद कोठे में इसे
मर्यादा-बद्ध किया गया। फिर ये सभागृह में और सिनेमा के पर्दे पर आया। क्या
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री साहब ये सब नहीं जानते? क्या संगीत बरी और
लावनी संस्कृति का हिस्सा नहीं है?जब दरबार या बैठक में नाच होता था, तो
क्या दर्शक शराब नहीं पीते थे?
आज भी गाँव के मेले में हजारों मर्दों के
सामने औरतें नाचती-गाती हैं। घर-घर में टीवी पर डांस देखा जाता है। उसी तरह
का डांस बार में हो, तो नेता संस्कृति और अश्लीलता की दुहाई देने लगते
हैं। शायद सुप्रीम कोर्ट को फिक्र इस बात की है कि बार में डांस के बहाने
औरत का शोषण ना हो।
ये फिक्र इंसानी तौर पर ठीक है, लेकिन इसका क्या फायदा
जब तक ‘शोषण’ और ‘अश्लीलता’ की कोई कानूनी परिभाषा ना बनाई जाए? मसला डांस
का नहीं है। मसला ये है कि डांस खत्म होने के बाद, बार बंद हो जाने के बाद
क्या होता है। बार में डांसर को छूना मना है, ये तो पहले भी नियम था।
अगर उस पर दबाव डाला जाता है कि किसी ग्राहक के साथ, या स्वयं बार के मालिक के साथ, संबंध बनाए या अपने जिस्म का सौदा करे, तो उस डांसर को यकीन होना चाहिए कि वो पुलिस के पास जा सकती है। साथ ही बार में डांस करने वालों का संगठन मजबूत होना चाहिए, ताकि अगर कोई बार मालिक कानून तोड रहा है तो उसके खिलाफ बुलंद आवाज उठा सकें।
उसे दुत्कारा-फटकारा नहीं जाएगा, इस भरोसे के साथ कोई बार डांसर पुलिस के पास जाए तो क्या उसके साथ ऐसा बर्ताव होगा कि जैसे किसी पुलिस वाले की बेटी थाने में आई हो यह शिकायत दर्ज कराने के लिए कि उसके दफ्तर में उस पर जिस्म का सौदा करने का दबाव डाला जा रहा है? क्या ये हो पाएगा?
इसका जवाब मेरे पास नहीं है। जवाब सिर्फ पुलिस दे सकती है और सरकार चलाने वाले नेता। लेकिन जब तक वे अपना दिल टटोल कर जवाब ढूँढते हैं, हमारे वकीलों और न्यायधीशों को भी अपना दिल टटोलना होगा और इस शब्द की परिभाषा सोचनी होगी। ‘अश्लीलता’ क्या है, इसकी परिभाषा कानूनी रूप से स्पष्ट हो और इस शब्द की आड में देश की जनता पर हमला करने वालों को कडी सजा दी जाए।