सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस जनहित याचिका पर सुनवाई से इंकार कर दिया, जिसमें गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान व्यक्तिगत जानकारी देने वाला शपथपत्र अपूर्ण दाखिल किया था। उन्होंने वैवाहिक स्थिति बताने वाला कॉलम खाली छोड़ दिया था।
चीफ जस्टिस पी. सदाशिवम व जस्टिस रंजन गोगोई की पीठ ने कहा कि ऐसे मुद्दों का निपटारा मुख्य चुनाव अधिकारी को करना चाहिए और अदालत का इरादा इस मामले पर गौर करने का नहीं है।
सुनील सरावगी की ओर से दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया था कि मोदी ने 2012 के विधानसभा चुनाव के अपने नामांकन पत्र के साथ अपूर्ण शपथपत्र दाखिल किया था।
सरावगी ने मोदी का नामांकन पत्र खारिज नहीं करने के चुनाव अधिकारी के निर्णय को रद्द करने की मांग की थी। याचिका में दावा किया गया था कि मोदी ने खाली छोड़े गए कॉलम में सिर्फ हाइफन का निशान लगाया था और यह सुप्रीम कोर्ट की ओर से चुनाव आयोग को दिए गए दिशा-निर्देशों से धोखा है।
पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि इस तरह की जनहित याचिका पर हम कोई आदेश नहीं जारी कर सकते। संबंधित व्यक्ति (मोदी) की ओर से चुनाव अधिकारी को शपथपत्र में इस तरह की कथित खामी के बारे में जानकारी दे चुके हैं। हम ऐसे मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकते।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसॉलविस ने दलील दी कि चुनाव अधिकारी की ओर से लिया गया निर्णय रिसर्जेंस इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से आयोग को दिए गए दिशा-निर्देशों के मुताबिक नहीं है।
हालांकि पीठ ने अधिवक्ता से कहा कि मोदी ने अदालत में दिए गए अपने जवाब में स्पष्ट किया है कि वह कॉलम खाली छोड़े जाने के संबंध में आयोग को जानकारी दे चुके हैं। इसी वजह से चुनाव अधिकारी की ओर से शपथपत्र को अस्वीकार नहीं किया गया।
इस मामले में हाईकोर्ट और इस अदालत की क्या भूमिका हो सकती है, जबकि वास्तविक जानकारी की पुष्टि पहले ही चुनाव अधिकारी की ओर से की जा चुकी हो।