तमिलनाडु के एक अस्पताल में जन्म के बाद डॉक्टरों की लापरवाही के कारण दोनों आंखों की रोशनी खोने वाली लड़की को सुप्रीम कोर्ट ने 1.7 करोड़ रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया है।
अब यह लड़की 28 वर्ष की हो गई है। इस दौरान उसके इलाज में 42 लाख रुपये खर्च हुए थे। मुआवजे की रकम में इलाज पर हुआ खर्च भी शामिल है। मुआवजा राज्य सरकार को देना है।
न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने तमिलनाडु सरकार की उस दलील को खारिज कर दिया कि यह मामला डॉक्टरों की लापरवाही का नहीं है। पीठ ने इसे इलाज में कोताही बरतने का मामला बताया है।
डॉक्टरों ने नहीं कराया था बच्ची का आरओपी टेस्ट
लड़की का जन्म 30 अगस्त 1986 को चेन्नई के एक सरकारी अस्पताल में हुआ था। जन्म के बाद उसे अगले 25 दिनों तक अस्पताल के आईसीयू में रखा गया। इस दौरान कभी भी डॉक्टरों ने रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योर (आरओपी) टेस्ट कराने के लिए नहीं कहा।
समय पूर्व जन्म होने पर आमतौर पर बच्चों का यह टेस्ट होता है। बच्ची को जब तक प्राइवेट डॉक्टर के पास दिखाया जाता तब तक देर हो चुकी थी। तब तक उसकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई थी।
पीड़ित परिवार की ओर से पेश वकील निखिल नैय्यर ने अदालत के समक्ष दलील थी कि चूंकि बच्ची नियमित रूप से अस्पताल के डॉक्टरों की निगरानी में थी, लिहाजा साफ है कि इस मामले में अस्पताल की ओर से कोताही बरती गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिया 1.7 करोड़ रुपए मुआवजे का आदेश
उन्होंने बताया कि अस्पताल के कई डॉक्टरों ने कई बार बच्चों का निरीक्षण किया था, लेकिन किसी भी डॉक्टर ने परिवार वालों को यह नहीं बताया कि समय पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों को रेटिना संबंधित परेशानी की आशंका प्रबल होती है।
तमिलनाडु सरकार ने राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के आदेश को चुनौती दी थी।
वहीं पीड़ित पक्ष ने मुआवजा बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उपभोक्ता आयोग ने वर्ष 2009 में पांच लाख मुआवजा देने का आदेश दिया था, लेकिन सरकार ने अब तक इसका भुगतान नहीं किया था।