मैं मुंबई के बीयर बारों के अपने अनुभवों की बात करूँगा तो आपका पहला सवाल यही होगा कि "आपका बीयर बारों से क्या नाता है?"अठारह साल पहले की बात है जब मैं एक 'बार एंड रेस्टोरेंट' में खाना खाने गया था जहाँ से ये सिलसिला शुरू हुआ। अंधेरे में डूबी अजीब-सी रंगीन जिंदगी की एक झलक दिखी, खुश दिखने वाली लडकियों में अथाह दुख-दर्द छिपा था।
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2005 में मैंने अपने उपन्यास 'सोनमछली' में इसी को पकडने की कोशिश की, इसके बाद डांस बार मेरी नजरों से ओझल नहीं हुए, खास तौर पर पाबंदी के बाद से, मैं हमेशा जानकारी जुटाता रहा हूँ।
पाबंदी लगने के बाद सरकार ने शिकंजा कसा, पुलिस ने छापे मारे, लडकियों की गिरफ्तारी हुई, उन्हें प्रोटेक्शन फ्रॉम इम्मॉरल ट्रैफिकिंग एक्ट के तहत कथित सुधारगृहों में भेजा जाने लगा, बार मालिकों को जेल जाना पडा, जुर्माना भरना पडा।काफी हद तक सुनियोजित कारोबार पूरी तरह तितर-बितर हो गया।
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रातों रात छिन गई रोजी रोटी
भारत के कोने-कोने से आई गरीब परिवारों की अर्धशिक्षित लडकियों की
रोजी-रोटी रातोंरात छिन गई, इनमें से ज्यादातर को सिवाय देह व्यापार के कोई
और रास्ता न मिला, कई लडकियों ने आत्महत्या तक की।जो जिस्मफरोशी से बचना
चाहती थीं, उन्हें भी कोई इज्जत की जिंदगी नहीं मिली।
इम्मॉरल ट्रैफिकिंग
रोकने के नाम पर जो कार्रवाई की गई उसका असर ये हुआ है कि इन लडकियों की
ट्रैफिकिंग करने वाले दलाल उन्हें खाडी के देशों में ले जाने लगे।अपने देश
से दूर, दुबई और कतर के होटलों में उन पर क्या-क्या गुजरी होगी आप सोच सकते
हैं।
होटल मालिकों और दलालों का हिस्सा चुकाने के बाद उनके हाथ बहुत कम
रकम आती, विदेश जाने के खर्चे के नाम पर उन पर भारी कर्ज चढ गया और बेचने
के लिए उनके पास सिर्फ एक ही चीज बची।ऐसी एक लडकी ने मुझे हिसाब समझाया,
"अक्सर तीन महीने का कांट्रैक्ट होता है, पैसे एडवांस मिलते हैं लेकिन उसके
बाद वे हमारी कमाई से पाँच गुना वसूल करते हैं, अगर तीन लाख रूपए मिले तो
अपनी कमाई से पंद्रह लाख चुकाने होते हैं, ज्यादातर लडकियों को रकम चुकाने
के लिए जिस्मफरोशी का सहारा लेना पडता है।"
एक फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने के
दौरान, डांस बारों के बंद होने के बाद उस धंधे से जुडी लडकियों से ही नहीं,
बल्कि दूसरे लोगों से भी काफी बातचीत हुई।डांस बार बंद होने के बाद भी कई
बारों में लडकियाँ रहीं लेकिन उन्हें नाचने की इजाजत नहीं थी, लोग बीयर
पीते हुए उन्हें घूरते रहते लेकिन जितने पैसे डांस करने पर मिलते थे, वो
खडे रहने के लिए नहीं मिल सकते थे।
पाबंदी के बावजूद ढेर सारे बार चलते रहे,
पुलिस के छापे पडते रहे, कुछ वक्त बार बंद रहते, फिर ले-देकर खुल जाते।
पुलिस को पाबंदी लागू कराने के नाम पर आसान कमाई का रास्ता मिल गया था।अब
सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से पाबंदी हट जाएगी लेकिन जिन लडकियों की जिंदगी
पटरी से उतर गई उनका कुछ भला नहीं होगा क्योंकि उनकी उम्र ढल चुकी है, उनकी
जगह कमसिन लडकियाँ ले लेंगी।
मेरे मन में अक्सर यही सवाल आता है कि नई पीढी
की जो लडकियाँ इस पेशे में उतरेंगी क्या उनकी जिंदगी पहले वाली लडकियों से
बेहतर होगी? ऐसी कोई उम्मीद रखना शायद खामखयाली होगी। क्या श्लील है और
क्या अश्लील, इसकी व्याख्या पांडु हवालदार ही करेगा, नैतिकता के ठेकेदार
अपनी दुकान चलाते रहेंगे, इन सबको सबसे आसान शिकार वही लगेगा जो सबसे कमजोर
है, वो ये लडकियाँ हैं।अगर आप कभी बीयर बार में जाएँ तो जगमगाती रोशनी,
चमकीले कपडों में थिरकती लडकियों को नैतिकता के चश्मे से नहीं, मानवता के
चश्मे से देखने की कोशिश करिएगा, शायद अलग तस्वीर दिखे।
(भारतेंदु विमल
बीबीसी के पूर्व प्रसारक हैं, इन दिनों कभी लंदन और कभी मुंबई में रहते
हैं)