जिला स्तर पर सरकारी वकीलों की नियुक्ति के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को यूपी सरकार को राहत प्रदान की।
सरकारी वकीलों के खाली पदों को भरने के लिए सर्वोच्च अदालत ने राज्य सरकार की गुजारिश पर 31 मई तक का समय प्रदान किया है।
अदालत ने गत वर्ष 13 नवंबर को चार माह के भीतर सभी नियुक्ति करने का आदेश दिया था। यह अवधि 13 मार्च को समाप्त हो गई थी।
यूपी सरकार ने दिया था लोकसभा चुनाव का हवाला
यूपी सरकार ने लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए शीर्ष अदालत से तीन माह के समय की मांग की थी। गत वर्ष शीर्षस्थ अदालत ने राज्य सरकार को ताकीद किया था कि नियुक्तियों में किसी राजनीतिक पार्टी का हित नहीं, बल्कि जनहित को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
साथ ही यूपी एलआर मैनुअल के प्रावधानों, सीआरपीसी की धारा 24 और सुप्रीम कोर्ट के जोहरीमल मामले में दिए गए फैसले का सख्ती से अनुपालन करते हुए सभी योग्य आवेदकों को ही नियुक्ति करने को कहा था।
जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी ने कहा कि सर्वोच्च अदालत के गत वर्ष के फैसले के आधार पर राज्य सरकार ने जिलाधिकारियों और जिला जजों से नए आवेदनों की सूची भेजने को कहा था। लेकिन उनकी ओर से पुराने आवेदकों की सूची भेजी गई। इस कारण चार माह में नियुक्तियां नहीं हो सकीं।
अदालत से गुजारिश है कि खाली पदों को भरने के लिए तीन माह का समय प्रदान करें। इस पर पीठ ने कहा कि राज्य को जिलों में सरकारी वकीलों की नियुक्ति जल्दी करनी चाहिए। जवाब में लेखी ने कहा कि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर राज्य सरकार तीन माह के समय की मांग कर रही है।
जनहित को ध्यान में रखकर हो सिफारिश
पीठ ने कहा कि अदालत राज्य सरकार को नियुक्ति पूरी करने के लिए 31 मई तक का समय प्रदान कर रही है। इस दौरान खाली पदों को भरा जाए।
याद रहे कि शीर्ष अदालत ने पिछले आदेश में कहा था कि एलआर मैनुअल, सीआरपीसी और जोहरीमल मामले के फैसले के मुताबिक जिला जज तथा जिला मजिस्ट्रेटों से नियुक्तियों पर राज्य सरकार का विचार-विमर्श जरूरी है।
इसमें पुनर्नियुक्ति के आवेदकों के पिछले कार्य, आचरण और प्रदर्शन के मुताबिक नियुक्ति के संबंध में सिफारिश की जानी चाहिए। ये सिफारिशें बड़े स्तर पर जनहित को ध्यान में रखते हुए की जानी चाहिए, न कि इसके उलट किसी खास राजनीतिक दल के हित के आधार को देखते हुए।
बसपा सरकार में हुए फेरबदल पर था विवाद
गौरतलब है कि सर्वोच्च अदालत में यह मामला पहले भी पहुंचा था। तब प्रावधानों में तत्कालीन बसपा सरकार में हुए फेरबदल का विवाद था।
पूर्ववर्ती सरकार ने 2008 में नियुक्ति के प्रावधानों में एलआर मैनुअल में जो संशोधन किया गया था उसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया था। उसके खिलाफ तत्कालीन सरकार शीर्षस्थ अदालत पहुंच गई थी। लेकिन सत्ता में आई सपा सरकार ने इस अपील को वापस लेकर हाईकोर्ट के आदेश को स्वीकार कर लिया था।
इसके बाद पुनर्नियुक्ति में देरी होने पर वकीलों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था जिस पर हाईकोर्ट ने गत वर्ष 7 दिसंबर को आदेश जारी किया और फिर सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील की।