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अब पर्दे पर नहीं आएगी गे राजकुमार पर बनी फिल्म

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सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता पर बनी एक गुजराती फिल्म का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया है। कोर्ट ने यह कहते हुए इस फिल्म पर रोक लगा दी कि समलैंगिकता समाज के कुछ लोगों के लिए एक सामाजिक अभिशाप की तरह है। समाज में समलैंगिकों की वास्तविक स्थिति पर बनाई गई इस फिल्म को मनोरंजन कर में छूट देने के गुजरात होईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।
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मेघधनिष्य: द कलर ऑफ लाइफ फिल्म को मनोरंजन कर में छूट देने के खिलाफ और प्रसारण पर रोक के लिए हाईकोर्ट में दायर की गई गुजरात सरकार की याचिका की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि किसी फिल्म के प्रसारण पर केवल इसलिए रोक नहीं लगाई जा सकता क्योंकि वह एक विवादित विषय पर आधारित है। इसके अलावा हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि यह संविधान से फिल्म के निर्माता निर्देशक देवमनी को मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन भी होगा।

हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अनिल आर दवे और आदर्श के गोयल की पीठ ने अपने अंतरिम आदेश में केआर देवमनी की फिल्म मेघधनिष्य- द कलर ऑफ लाइफ को मनोरंजन कर में छूट देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि समलैंगिकता समाज के कुछ लोगों के लिए एक सामाजिक अभिशाप की तरह है इसलिए इसपर आधारित फिल्मों को नहीं दिखाया जा सकता।
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'मेरी फिल्म को मार दिया गया'

कोर्ट के कहा कि इस मामले में अंतिम फैसला इस मुद्दे से जुड़े अन्य मामलों की सुनवाई पूरी हो जाने के बाद ही आएगा। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब इस फिल्म पर अगले तीन साल तक कोई सुनवाई नहीं होगी। यह फिल्म गुजरात के राजपिपला के राजकुमार मानवेंद्र सिंह गोहिल के जीवन पर आधारित है। मानवेंद्र ने कहा मेघधनिष्य फिल्म 'गे प्रिंस ऑफ राजपिपला' के वास्तविक जीवन पर आधारित है और इसे सेंसर बोर्ड ने भी पास कर दिया था।

द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान देवमनी ने कहा, 'मुझे लगता है फिल्म की मौत हो गई। हम अगले तीन चार सालों तक इंतजार नहीं कर सकते और यह भी जरुरी नहीं है कि इसके बाद भी फैसला हमारे पक्ष में ही आएगा।' उन्होंने कहा कि जिन फिल्मों में विवाहेत्तर संबंध, बलात्कार और हिंसा जैसे दृश्यों को दिखाया जाता है उन्हें छूट दे दी जाती है लेकिन एक समलैंगिक व्यक्ति की समाज में वास्तविक स्थिति पर आधारित इस फिल्म को प्रसारित करने से रोकना ठीक नहीं है।

फोटो सौजन्य से: द इंडियन एक्सप्रेस
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1997 से मनोरंजन कर में सौ फीसदी छूट

देवमनी ने कहा कि गुजरात सरकार 1 अप्रैल 1997 के बाद से जितनी भी गुजराती कलर फिल्में बनीं है उन्हें मनोरंजन कर में 100 फीसदी का छूट देती आ रही है। भले ही वह फिल्म अंधविश्वास, सती प्रथा, दहेज उत्पीड़न जैसे सामाजिक कुरीतियों पर ही आधारित क्यों न हो। इनमें से तो कुछ ऐसी फिल्में भी हैं जो 'राष्ट्रीय सुरक्षा' के खिलाफ भी थीं लेकिन मेरी फिल्म को यह छूट नहीं मिली।

देवमनी की फिल्म को राज्य के मनोरंजन कर कमिश्नर ने यह कहते हुए मनोरंजन कर में छूट देने से इनकार कर दिया था कि इस फिल्म के प्रसारण से राज्य में समलैंगिकता को बढ़ावा मिलेगा जो समाज के लिए हानिकारक है। उन्होंने यह भी कहा था कि कोई भी 'सभ्य परिवार' इस फिल्म को देखना पसंद नहीं करेगा। टैक्स कमिश्नर के इस फैसले के बाद देवमनी ने हाईकोर्ट का रुख किया। उन्होंने अपने दलीली में कहा कि टैक्स कमिश्नर 'सुपर सेंसर बोर्ड' की भूमिका निभा रहे हैं।

देवमनी ने अपनी दलील में कहा की आईपीसी की धारा 377 के मुताबिक समलैंगिक होना अपराध नहीं है। जिसके बाद फरवरी 2014 में होईकोर्ट ने गुजरात सरकार के फैसले को गलत करार देते हुए मेघधनिष्य- द कलर ऑफ लाइफ को कर में छूट देने का आदेश दिया था जिसके खिलाफ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। मेघधनिष्य फिल्म मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी।
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