गरीबी से तंग आकर अपनी पत्नी और दो बेटों की हत्या करने वाले शख्स की फांसी की सजा को खारिज कर सुप्रीम कोर्ट ने उम्र कैद की सजा में बदल दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कर्ज में डूबे दर्जी ने गरीबी के कारण परिवार के सभी सदस्यों को खत्म करने का मन बना लिया था। लेकिन बेटी के जग जाने और उसके मासूम सवालों ने पिता को चौथी हत्या करने से रोक दिया।
परिवार के सभी सदस्यों की हत्या के बाद सुनील दामोदर गायकवाड़ खुदकुशी करना चाहता था लेकिन बेटी के अचानक जगने के कारण वह ऐसा नहीं कर सका।
मृत्यु दंड से पहले विवशताओं पर भी गौर करें
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उम्रकैद तो नियम है जबकि मृत्यु दंड अपवाद है और अदालतों को मौत की सजा सुनाते वक्त दोषी की निर्धनता जैसी सामाजिक-आर्थिक विवशताओं पर भी गौर करना चाहिए।
अदालत ने कहा कि मृत्यु दंड के मामले में निर्धारित पैमाने के अलावा निर्धनता, सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां, मानसिक विवशता और जीवन में दुर्दिन ऐसे ही कुछ पहलू हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
जस्टिस सुधांशु ज्योति मुखोपाध्याय की अध्यक्षता वाली पीठ ने महाराष्ट्र में आठ जुलाई, 2008 के मामले में पत्नी और दो बेटों की हत्या के जुर्म में दोषी की मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि हम कह सकते हैं कि हत्या के जुर्म में उम्र कैद नियम है और मृत्यु दंड अपवाद है जिसके लिये विशेष कारणों का उल्लेख करना होगा।
आरोपी के सुधरने की संभावना
अदालत ने कहा कि गरीबी से त्रस्त यह व्यक्ति अपना और अपने पूरे परिवार का ही जीवन खत्म करना चाहता था लेकिन अदालत ने उसे मौत की सजा सुनाते वक्त इस तथ्य पर ध्यान ही नहीं दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि साक्ष्य में यह सामने आया है कि अपीलकर्ता आर्थिक और मानसिक विवशता का शिकार था। आरोपी के सुधरने और उसके पुनर्वास की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
अभियुक्त का पहले का कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं है। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अभियुक्त समाज के लिये कोई खतरा नहीं होगा।