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गंगा में प्रदूषण पर केंद्र को सुप्रीम कोर्ट की फटकार

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि गंगा जगह-जगह सूख रही है और बात हो रही है पनबिजली परियोजनाओं की। शीर्ष अदालत ने सिमट रही गंगा पर चिंता जताते हुए कहा कि यह तो अब टुकड़ों में बह रही है। वास्तव में शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार द्वारा गंगा बेसिन में जल विद्युत परियोजनाओं को मंजूरी देने पर सवाल खड़ा किया है।
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अदालत ने यह टिप्पणी एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान की जिसमें आरोप लगाया गया कि बिना पर्यावरण का ख्याल रखे हुए पन बिजली परियोजनाओं को हरी झंडी दी जा रही है। याचिका फ्लोरिडा विश्वविद्यालय से पीएचडी धारक भरत झुनझुनवाला सहित अन्य लोगों ने दायर की है।

चीफ जस्टिस टी.एस. ठाकुर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि गंगा पहले ही से किलोमीटर दर किलोमीटर खंडों में बह रही है। ऐसे में क्या यहां और पनबिजली परियोजनाओं की दरकार है। पीठ ने कहा कि पनबिजली परियोजनाओं का गुण-दोष बहस का मुद्दा है।
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पर्यावरण पर भारी असर

पीठ ने पाया कि इस तरह का मामला सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य पीठ के समक्ष लंबित है। लिहाजा पीठ ने केंद्र सरकार और याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील पीएस शारदा और उस मामले की स्थिति से अवगत करने के लिए कहा है। अदालत ने मंगलवार तक के लिए सुनवाई टालते हुए दोनों पक्षों को यह बताने के लिए कहा कि दूसरी पीठ के समक्ष चल रहा मामला किस चरण में है।

गौरतलब है कि न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ उत्तराखंड की 24 जल विद्युत परियोजनाओं से संबंधित मामलों पर सुनवाई कर रही है। भरत झुनझ़नवाला द्वारा दाखिल याचिका में दावा किया गया है कि टिहरी गढ़वाल जिले में बन रहे कोतलीबेल पावर प्रोजेक्ट का इनवॉयवन्रमेंट कॉस्ट सलाना 798.7 करोड़ रुपये है जबकि इसका फायदा 155.5 करोड़ रुपये का है।

पीठ ने पूछा कि क्या यह प्रोजेक्ट गंगा बेसिन पर है। गंगा तो कुछ जगहों पर सूख गई है। याचिका में गुहार की गई है कि गंगा यमुना अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों के किनारे में पनबिजली परियोजनाओं को हरी झंडी देने से पहले उनके सोशल और इनवॉयरन्मेंट कॉस्ट का आकलन होना चाहिए।
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