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SC ने नेता प्रतिपक्ष पर खारिज की याचिका

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लोकसभा में कांग्रेस के सदस्य को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा न दिए जाने के खिलाफ दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जनहित याचिका की आड़ में राजनीतिक मुद्दे अदालत में हल नहीं किए जा सकते।
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चीफ जस्टिस आरएम लोढा, जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस रोहिंटन नरीमन की पीठ ने कहा कि लोकसभा के स्पीकर का निर्णय अदालती समीक्षा के दायर में नहीं आता। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक मुद्दों का निपटारा नहीं कर सकता।

पीठ ने बिना किसी होमवर्क के याचिका दायर करने पर वकील मनोहर लाल शर्मा की खिंचाई की। वकील शर्मा का तर्क था कि नेता प्रतिपक्ष का मुद्दा संसदीय अधिनियम, 1977 के आलोक में देखा जाना चाहिए।
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पद को लेकर चल रही थी खींचतान

शर्मा ने कहा कि इस कानून की धारा दो के तहत संसद के दोनों सदनों में सरकार के विरोध में सर्वाधिक संसद सदस्यों वाली पार्टी को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा दिए जाने का प्रावधान है।

इसलिए लोकसभा में विरोधी दलों में से जिसके भी सांसदों की संख्या सर्वाधिक हैं, उसके सदस्य को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा प्रदान किया जाए।

गौरतलब है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष को लेकर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच चुनाव के बाद से खींचतान चल रही है। अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने भी लोकसभा अध्यक्ष को दी गई राय में कांग्रेस के दावे को खारिज कर दिया है।
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नहीं हो पाया है अभी तक फैसला

अटार्नी जनरल ने अपनी राय में कहा है कि लोकसभा सदस्यों की कुल सीट का न्यूनतम दस प्रतिशत हासिल होने पर ही संबंधित राजनीतिक दल के सदस्य को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा दिया जा सकता है।

लोकसभा के कुल सदस्यों का संख्या 543 है जबकि 16वीं लोकसभा में कांग्रेस के निर्वाचित सदस्यों की तादाद केवल 44 है। इस कारण कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष की हकदार नहीं है।
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