मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान हुए बलात्कार मामले के आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को तीन सप्ताह में उठाए गए कदमों के बारे में सूचित करने को कहा है।
सर्वोच्च अदालत ने राज्य सरकार से कहा कि पीड़ितों को मुआवजा मुहैया कराने और आरोपियों को गिरफ्त में लेने के मसले पर कोताही नहीं बरतें। सर्वोच्च अदालत में बलात्कार पीड़िताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कामिनी जायसवाल ने आरोप लगाया कि अदालत के निर्देशों के बावजूद राज्य सरकार ने बड़ी लापरवाही बरती।
इस पर राज्य सरकार ने कहा कि चौदह आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। मुआवजे के संबंध में अदालत की ओर से जारी निर्देश का अनुपालन भी जल्द किया जाएगा। तब जायसवाल ने कहा कि अवमानना याचिका पर नोटिस जारी होने से पहले तक कोई भी आरोपी नहीं गिरफ्तार किया गया था। यही नहीं एक मामले में तो क्लोजर रिपोर्ट तक दाखिल कर दी गई है।
राज्य सरकार बलात्कार के आरोपियों को बचा रही है। जायसवाल की दलील पर यूपी सरकार ने यह माना कि आरोपियों को अवमानना याचिका पर नोटिस जारी होने के बाद गिरफ्तार किया गया। साथ ही कहा कि इस मामले में उसकी ओर से कोई लापरवाही नहीं बरती जा रही है।
गंभीरता से ले यूपी सरकार मामला
राज्य सरकार की दलील पर सर्वोच्च अदालत ने कहा कि यूपी सरकार को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। इसमें कोई कोताही नहीं बरती जानी चाहिए। यह बहुत ही गंभीर मामला है।
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार तीन सप्ताह में हमें यह बताए कि पीड़ितों के मुआवजे और आरोपियों को गिरफ्तार किए जाने के संबंध में क्या कदम अब तक उठाए गए हैं।
याद रहे कि 6 अक्टूबर को अदालत ने पीड़िताओं की ओर से दायर अवमानना याचिका पर राज्य सरकार से जवाब तलब किया था। जबकि इससे पहले सात पीड़िताओं की ओर से राज्य सरकार की ओर से 26 मार्च के फैसले में दिए गए निर्देशों का अनुपालन नहीं किए जाने की आरोप लगाया गया था।
गौरतलब है कि शीर्षस्थ अदालत ने सामूहिक बलात्कार पीड़िताओं की याचिका पर राज्य सरकार को तीन निर्देश जारी किए थे।
दंगों में मारे गए थे कई लोग
पहला निर्देश सभी आरोपियों को निर्धारित समय में गिरफ्तार किए जाने का था। इसमें पीडिताओं का बयान महिला मजिस्ट्रेट के समक्ष सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज कराने को कहा गया था।
दूसरे निर्देश में बलात्कार पीड़िताओं को उनकी जरूरत या ट्रायल पूरा होने तक सुरक्षा मुहैया कराए जाने का था। जबकि तीसरा निर्देश हरेक पीड़िता को पांच लाख रुपये का मुआवजा फैसले की तिथि से चार हफ्ते में दिए जाने को कहा गया था।
याद रहे कि मुजफ्फरनगर व उसके निकट क्षेत्रों में गतवर्ष 7 सितंबर को सांप्रदायिक हिंसा हुई थी जिसमें 40 लोग मारे गए थे और 85 घायल हुए थे। इसके अलावा करीब 51 हजार लोगों को घरबार छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। इनमें से अधिकतर मुसलमान थे। जनहित याचिका दंगा पीड़ित मोहममद हारुन व अन्य की ओर से सर्वोच्च अदालत में दायर की गई थी।