सूचना के अधिकार के तहत शारीरिक तौर पर अक्षम व्यक्तियों के हित में पूछे गए कुछ सवालों का जवाब हिंदी में देने से सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने इंकार कर दिया है।
मुख्य जन सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) ने राजभाषा में जवाब न देते हुए कहा है कि सर्वोच्च अदालत के कार्यालय की भाषा अंग्रेजी है।
उन्होंने अदालत के नियमों और संविधान के अनुच्छेद 348 का हवाला भी दिया है।
जबकि आरटीआई एक्ट के तहत सूचनाएं अंग्रेजी और हिंदी, दोनों ही भाषाओं में मांगी जा सकती है।
इसके अलावा हाल ही में शीर्षस्थ अदालत ने ही एक मामले में स्पष्ट किया था कि भाषा आधारित दक्षता न होने पर आम जनता को किसी राज्य में परेशानी नहीं होनी चाहिए।
आवेदन, अपील या पेशकश हिंदी-अंग्रेजी में कर सकते हैं।
उत्तर प्रदेश के हापुड़ निवासी सामाजिक कार्यकर्ता विकास शर्मा की ओर से सुप्रीम कोर्ट से विकलांग लोगों के संबंध में सरकार, विभागों को अदालत की ओर से दिए गए सुझावों, आदेश व निर्णय की मांग की गई थी।
आरटीआई में पांच सवाल किए गए थे, जिनके जवाब हिंदी में दिए जाने की मांग करते हुए यह भी पूछा गया था कि सर्वोच्च अदालत में बतौर न्यायाधीश, प्रशासनिक कार्यालय व आदि पदों पर कितने विकलांग लोग कार्यरत हैं।
जवाब में अतिरिक्त रजिस्ट्रार व सीपीआईओ ने हिंदी में जवाब न देते हुए स्पष्ट किया कि शीर्षस्थ अदालत के कार्यालय की भाषा अंग्रेजी है।
अंग्रेजी में पहले और दूसरे सवाल के जवाब देते हुए सीपीआईओ ने सूचनाएं एकत्रित न किए जाने, तीसरे व चौथे को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर करार दिया है। जबकि पांचवें सवाल का कोई जवाब ही नहीं दिया गया है।
आरटीआई कार्यकर्ता के मुताबिक सर्वोच्च अदालत प्रशासन सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए सवाल का जवाब देने से इंकार नहीं कर सकता क्योंकि आरटीआई एक्ट में लोक प्राधिकरणों एवं जन सूचना अधिकारियों को इस संबंध में स्पष्ट निर्देश दिया गया है।
ऐसे में हिंदी में जवाब देने से सीपीआईओ इंकार नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि अदालत के कार्य की भाषा अंग्रेजी है। लेकिन सीपीआईओ तो आरटीआई अधिनियम के मुताबिक मांगी गई सूचनाओं का जवाब देंगे, न कि सुप्रीम कोर्ट के नियमों के तहत जवाब देंगे।
शर्मा ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट सीपीआईओ के जवाब के खिलाफ अपील करेंगे।
पिछले महीने मई में सर्वोच्च अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला जारी कर एक नौसेना कर्मचारी की ओर से हिंदी में दस्तावेज उपलब्ध कराने की मांग को सही ठहराते हुए बांबे हाईकोर्ट के फैसले को दरकिनार कर दिया था।