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'मां को चाय बनाकर पिलाते थे बाबूजी'

Wed, 02 Oct 2013 04:42 PM IST
सुनील शास्त्री/दिल्ली
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पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जिक्र होते ही हर व्यक्ति का सिर श्रद्धा से झुक जाता है। लोग उनकी वजह से हमको अथाह प्यार करते हैं। सरकारें भले ही उस शख्सियत को भूल गई हों, लेकिन लोग उन्हें नहीं भूले।
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आज भी लोगों की आंखें उनकी बात करते-करते नम हो जाती हैं। बहुत बड़ा परिवार है लाल बहादुर शास्त्री का। बहुत कम नेताओं को ऐसी शोहरत, प्यार और सम्मान मिल पाता है।

उनका बेटा होने के नाते मेरे लिए यह सुखद है कि बाबूजी का परिवार केवल हमारे घर तक सीमित नहीं, बल्कि जन-जन के हृदय में बसा हुआ है। 19 अक्तूबर 65 में दिए उनके नारे ‘जय जवान-जय किसान’ की प्रासंगिकता उसी तरह बनी हुई है।
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'हमारे परिवार ने सबसे पहले रखा व्रत'
यह नारा देने के बाद बाबूजी जब तक जिंदा रहे, देश को आत्मनिर्भर बनाने की हर संभव कोशिश की। देश में अकाल को देखते हुए उन्होंने जब एक वक्त का खाना छोड़ने का आह्वान किया तो हमारे परिवार को सबसे पहले इस व्रत से जोड़ा।

कई दिन तक हमारे परिवार ने एक समय का खाना ही खाया। प्रधानमंत्री थे लेकिन बाहर निकलते हुए अपने कमरे की लाइट खुद बंद करके जाते थे। आज अगर लोग उन्हें याद कर रहे हैं तो शायद इसकी वजह उनकी ईमानदारी, पारदर्शिता और सादगी है।

'जख्मी सैनिक की बात पर जब रोए बाबूजी'
जब वह प्रधानमंत्री थे तो युद्ध के दौरान दिल्ली आर्मी अस्पताल में घायल सैनिकों को देखने जाते थे। एक दिन मुझे भी अपने साथ ले गए। मैंने देखा कि बाबूजी एक जख्मी सैनिक के माथे पर हाथ रखकर उससे बातें कर रहे हैं।

वह कोई और नहीं मेजर भूपेंद्र सिंह थे। बाबूजी को सामने देख उनकी आंखों से आंसू टपकने लगे। बाबूजी ने उनसे कहा, तुम देश के बहादुर सैनिक हो, तुम्हारी आंखों में ये आंसू क्यों?

मेजर का कहना था कि मैं इसलिए नहीं रो रहा कि जिंदा रहूंगा या नहीं, मैं तो इसलिए रो रहा हूं प्रधानमंत्री मेरे सामने हैं और मैं उठकर सैल्यूट भी नहीं दे पा रहा हूं। बाबूजी की आंखों में मैंने भी उस दिन पहली बार आंसू देखे।

'चाय बनाकर मां को पिलाते थे'
उनका जीवन बहुत संयमित था। अमूमन पांच बजे सुबह उठ जाते थे। कुछ देर टहलते थे। सुबह उठकर दो कप चाय बनाते। मां को भी चाय पिलाते थे। फिर तल्लीनता से अखबार पढ़ते। नहा धोकर आते, नाश्ता करते।

उसी समय मां उनको रामायण पढ़कर सुनाती। बहुत सादा खाना खाते। लौकी, दाल, सब्जी और कोई मौसमी फल। बाबूजी से हमने दो बातें खासकर सीखीं। एक तो हमेशा सच बोलना और दूसरा अपने देश को बहुत प्यार करना।

'विदिशा में था जब उनका निधन हुआ'
उनका आखिरी दिन याद आता है। वह वार्ता के लिए ताशकंद गए थे। उस दिन मैं विदिशा में था। हमें अचानक बताया गया कि वापस भोपाल जाना है। कुछ समझ में नहीं आया।

भोपाल हवाई अड्डे पर भीड़ देखी और झंडा आधा झुका देखा तो मुझे लगा कि किसी बड़े व्यक्ति का निधन हुआ है। घर पहुंचा तो मुझसे किसी ने कहा कि उस कमरे में जाकर मां से मिल लो।

मेरी नजर उनके माथे पर पड़ी उसमें वो टीका नहीं था जिसे वह रोज सुबह लगाया करती थी। मां जोर-जोर से रोने लगी। तब मुझे पता लगा कि मेरे बाबूजी और देश के प्यारे नेता इस दुनिया में नहीं रहे।
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प्रस्तुतिः वेद विलास उनियाल
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