ये जीवन कांटों की राह का ही नाम है। यह बात मेरठ के रसूलपुर धौलड़ी की रहने वाली सलमा सुलताना पर सटीक बैठती है। पिता सलमा को डॉक्टर बनाना चाहते थे लेकिन सलमा अपने भीतर की कला को बाहर लाना चाहती थीं।
महिलाओं पर हो रहे अत्याचार और भेदभाव को सलमा ने बड़े करीब से देखा। रोज ऐसे वाकयों से सामना होता जहां बेटों को बेटियों से ऊपर ही रखा जाता।
सबसे पहले सलमा ने गली की गरीब बच्चियों को पढ़ने के प्रेरित किया। इन बच्चियों के लिए अपने रुपयों से पढ़ने की साम्रगी उपलब्ध कराई। पिता से मिलने वाला जेब खर्च भी सलमा गरीब बच्चों की खुशियों पर लुटा दिया करती थीं।
आठवीं पास करने के बाद पढ़ने के लिए सलमा शहर आईं और वो बच्चियां गांव में ही छूट गईं जो सलमा के सहारे थीं। यहां सलमा ने इन बच्चियों के दर्द की कहानियों को पन्नों पर उतारा। यह कहानियां अखबार में छपने लगीं। लेकिन यहां फिर सलमा की जिंदगी में एक मोड़ आया। 18 साल की उम्र में शादी के बाद उनकी जिंदगी जेल के कैदी की तरह हो गई। खुले विचारों की सलमा को ससुराल के अत्याचार झेलने पड़े।
आजाद पंछी की तरह उड़ने वाली सलमा ससुराल की चार दीवारी में कैद रहकर बीमार हो गईं और अस्पताल में भर्ती हो गईं। वापस मायके आईं। पिता गुजर चुके थे। कलम उठाई और फिर लिखना शुरू किया। सबसे पहले 'भूल का अहसास' नाम की जो कहानी लिखी उसे कई पुरस्कार मिले।
2008 में उनकी कहानियां आकाशवाणी पर प्रसारित होने लगीं। सलमा ने दूरदर्शन पर लाइव शो दिए। 2010 में उनकी कहानियों की किताब प्रकाशित हूई। समाज में होने वाले महिला अत्याचारों की हकीकत उनकी कहानियों में दिखती हैं।
उनकी कहानियां समाज को बदलने के लिए मजबूर करती हैं। लिखने के साथ-साथ सलमा मोहल्ले के गरीब बच्चों को पढ़ाने में खुशी मिलती है। सलमा समाज में जाकर लोगों को बेटियों का सम्मान करने और भ्रूण हत्या को रोकने की अपील करती हैं। सलमा गरीब और बेसहारा बच्चों के लिए एक आश्रम खोलना चाहती हैं।