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नाली सफाई से IIT-BHU तक का सफर, दर्द भरी है ये कहानी

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मुसीबतों ने जिद ठान रखी थी राह रोकने की और उसने भी हौसला जुनून की हद तक फौलादी बना लिया था। हालात ऐसे थे कि लगा कहीं हिम्मत टूट न जाए लेकिन उम्मीदों की लौ जलती रही।
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मुश्किलों का अंधेरा दिनों-दिन स्याह-गाढ़ा होता रहा, लेकिन आंखों का सपना टूटने नहीं दिया। आईआईटी बीएचयू में दाखिला तो मिल गया लेकिन महेश का संघर्ष अब भी जारी है...।

अलवर (राजस्थान) के रहने वाले महेश के साथियों, सहपाठियों को शायद इस बात का गुमान भी नहीं होगा कि उन्होंने बचपन से लेकर आईआईटी बीएचयू में दाखिला लेने तक का सफर किन कठिन राहों से होकर पूरा किया है।
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इंजीनियर बनने का सपना कुछ ऐसा था कि आईआईटी की कोचिंग के लिए महेश ने कर्ज ले लिया। बाद में उस कर्ज और ब्याज के बोझ तले इस कदर दबा कि उसे चुकाने के लिए नाली की सफाई की, शादी-ब्याह में जूठे बरतन तक धोए। नौबत किडनी बेचने तक आई लेकिन फिर एक रोशनी की किरण उनके हिस्से में भी आई।

बचपन से ही पढ़ाई में होनहार आईआईटी बीएचयू के माइनिंग इंजीनियरिंग के सेकंड ईयर के छात्र महेश कुमार के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। स्कूल की फीस भरने के लिए भी उन्होंने अपने ही स्कूल में झाडू तक लगाई।
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मुश्किल से चलता था घर

पिता लकवाग्रस्त थे और मां दूसरे के घरों में चूल्हा-चौका कर दो वक्त की रोटी का इंतजाम करती थीं। स्कूल की शिक्षा तो जैसे-तैसे पूरी हो गई लेकिन महेश को इंजीनियर बनने का सपना पूरा करना था और जयपुर में कोचिंग के लिए उन्होंने डेढ़ लाख रुपये कर्ज ले लिए।

मेहनत और लगन से महेश ने वर्ष 2014 में जेईई में ऑल इंडिया 1573 रैंक हासिल की और आईआईटी बीएचयू में दाखिला ले लिया, लेकिन तब तक ब्याज समेत कर्ज चार लाख रुपये तक पहुंच गया।

कर्ज चुकाने के लिए उन्होंने जयपुर में कोचिंग के साथ साथ नाली की सफाई की, मजदूरी की, शादी ब्याह में बर्तन धोए, तंदूर में रोटियां तक सेंकी लेकिन कर्ज के पहाड़ को काट नहीं सका। कर्ज के चलते वो अवसादग्रस्त होने लगे।
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किडनी बेचने का किया फैसला

इसी दौरान उन्होंने किडनी बेचने तक का फैसला ले लिया लेकिन इसी बीच संस्थान के विजिटिंग प्रोफेसर डॉ. संदीप पांडेय से मुलाकात के बाद उनकी उम्मीद को सहारा मिला। डॉ. पांडेय ने संस्थान के ही एक पुरातन छात्र आशीष भारतीय से महेश के लिए मदद मांगी।

आशीष जी ने कर्ज का काफी हिस्सा चुका दिया है। एक लाख अब भी बाकी हैं जिसे महेश खुद चुकाना चाहते हैं। कॉलेज और हॉस्टल की फीस भरने के साथ ही महेश अपना खर्च चला सकें, इसके लिए डॉ. संदीप पांडेय बनारस के कई कोचिंग संस्थानों से बात कर रहे हैं।

गर्मी की छुट्टियों में बरेली के एक कोचिंग संस्थान में गणित पढ़ाकर महेश ने महीने भर में 20 हजार रुपये कमाए। जिंदगी की जद्दोजहद के बीच एमटेक और पीएचडी कर वैज्ञानिक बनने का सपना सजाने वाले महेश कहते हैं कि हौसलों के दम पर उनका सपना जरूर साकार होगा, विश्वास है।
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