समाज के चेहरे पर हंसी और खुशी पैसों से नहीं आती। समाज चहकता है शिक्षा के सुर से। इस सुर के लिए सहारनपुर की डॉ. कुदसिया अंजुम ने अपनों से भी लड़ाई लड़ी और गैरों से भी।
बरसों बीत गए, लेकिन बात ही कुछ ऐसी थी कि सहारनपुर की डॉ. कुदसिया अंजुम को आज भी अच्छी तरह याद है। वह कॉलेज की पढ़ाई पूरी करेंगी, उनकी यह घोषणा रिश्तेदारों और सगे-संबंधियों के बीच 'एटम बम' के विस्फोटक की तरह थी। लेकिन लगन हो, तो मुश्किलें आसान हो जाती हैं। जिस समाज में घर से निकलने की मनाही थी, वहां अंजुम पीएचडी की डिग्री घर लेकर आई।
अंजुम के लिए यह कोई मंजिल नहीं, बस एक पड़ाव भर था। अब वह दूसरी लड़कियों को भी पढ़ते देखना चाहती थीं। चाहत अच्छी थी, मगर आसान नहीं। डॉ. अंजुम ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद 1982 में सहारनपुर के `महाराज सिंह डिग्री कॉलेज’ में पढ़ाने का काम शुरू किया। इसके बाद जब 1984 में `इंडस्ट्रीयल मुस्लिम गर्ल्स इंटर कॉलेज’ में राजनीति शास्त्र पढ़ाना शुरू किया, तो बालिकाओं की शिक्षा पर लगी सामाजिक पाबंदी देखकर उनकी चाहत ने जिद का रूप ले लिया।
वह अपने समाज की लड़कियों को पढ़ाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने लगीं। फिर 1999 में कुछ साथियों के साथ मिलकर 'परचम' संस्था की नींव रखी और इसी माध्यम से आर्थिक और बाल मजदूरी के कारण पढ़ाई छोड़ चुकी लड़कियों और बच्चों को दोबारा शिक्षा से जोड़ने के लिए `दस्तक' नाम से अभियान शुरू किया। यही नहीं, डॉ. कुदसिया, जबरन पढ़ाई रुकवाने वाले परिवारों की भी काउंसलिंग करने लगीं।
आज उसी का नतीजा है कि उनके इलाके में सैकड़ों बच्चियों को दोबारा स्कूल जाने का मौका मिल पाया और वे अपने सपनों को पूरा कर रही हैं। अंजुम अपनी संस्था `परचम’ के माध्यम से असहाय व गरीब बालिकाओं को स्वरोजगार के लिए छह माह का प्रशिक्षण भी उपलब्ध करा रही हैं। सद्भाव मंच के माध्यम से वह सम्प्रदायिकता के खिलाफ भी अभियान चला रही हैं। अपने अभियान से अंजुम ने स्कूल-कॉलेजों के छात्रों को जोड़ा है, जो लोगों को शिक्षा और सद्भाव की बात समझाते हैं।
राशन कार्ड बनवाने से लेकर सरकारी योजनाओं का लाभ दिलवाने तक डॉ. अंजुम मदद करती हैं। छोटी-छोटी बातों पर टूटते परिवारों को जोड़ने के लिए अंजुम पुलिस लाइन में काउंसलिंग भी करती हैं।
अब तक वह सौ से अधिक परिवारों को जोड़ चुकी हैं। पर्यावरण जागरूकता, साम्प्रदायिकता के खिलाफ जागरूकता, बालिकाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें शिक्षित करने के अपने इस प्रयास पर वह बस इतना भर कहती हैं-`मैं समाज के हर एक चेहरे पर खुशी देखना चाहती हूं। मुझे खिले चेहरों के गुलदस्ते पसंद हैं।’