दर्द से भरी और हताशा से घिरी जिंदगी में मुस्कान घोलना आसान काम नहीं, लेकिन कमलेश कुमारी पालीवाल इस कठिन कार्य को बेहद आसानी से कर रही हैं। अशक्त बच्चों को आत्म-निर्भर बनाने का बीड़ा उठाकर कमलेश ने समाज को एक नया रास्ता दिखाया है।
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर (कॉमर्स विभाग) कमलेश कुमारी पालीवाल ने कॉलेज के दिनों में ही साथियों के साथ मिलकर एक ग्रुप बना लिया था और मलिन बस्तियों के गरीब बच्चों को शिक्षित करने का काम करने लगी थीं।
इससे पहले अपने बुलंदशहर के सतोहा गांव में कमलेश ने सांप्रदायिक दंगों के दौरान `पीस प्रोग्राम’ भी चलाया था, जिसके लिए 1991 में उन्हें पुलिस विभाग से सद्भावना पुरस्कार मिला था। उसके बाद नेहरू युवा केंद्र और यूथ हॉस्टल एसोसिएशन से जुड़कर कमलेश सामाजिक कार्यों से जुड़ी रहीं।
आज वह इलाहाबाद में मूक-बधिर बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लाने का कार्य कर रही हैं। 2012 में कमलेश ने चिराग हेल्पिंग आॅर्गेनाइजेशन की शुरुआत की। यह संस्था निर्माणाधीन इमारतों में मजदूरी कर रहे परिवारों के बच्चों को शिक्षित करने के साथ-साथ मूक-बधिर बच्चों को शिक्षा देने और स्किल डेवलपमेंट की दिशा में कार्य कर रही हैं।
अब तक 100 से अधिक बच्चे इस प्रोग्राम से लाभान्वित हो चुके हैं। मूक-बधिर बच्चों की शिक्षा पर उनका ज्यादा जोर है। अपनी संस्था और सरकार की मदद से वह विकलांग बच्चों के लिए एक साल का स्पेशल एजुकेशन प्रोग्राम, स्किल डेवलपमेंट और हॉबी क्लासेज प्रोग्राम भी चला रही हैं, जिससे अशक्त बच्चे आत्मनिर्भर होकर समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें। महिलाओं पर बढ़ते एसिड अटैक की घटनाओं से आहत कमलेश, एसिड की खुली बिक्री को रोकने की कवायद में भी जुटी हैं।
2010 में उन्होंने एक संस्था के साथ मिलकर हाईकोर्ट में एसिड की खुली बिक्री के खिलाफ पीआईएल दाखिल किया था। हाईकोर्ट से सफलता मिलने के बाद वह सुप्रीम कोर्ट भी गईं और खुले में बिकने वाले एसिड पर रोक भी लगवाईं। कमलेश कहती हैं, `मेरा मकसद अक्षम बच्चों को शिक्षित और स्वरोजगार की दिशा में सक्षम बनाना है। समाज को यह समझाना चाहती हूं कि शारीरिक रूप से अक्षम होना कोई अपराध नहीं।’