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बेटी को मजबूत बनाएं, बेटों को बचाएं

Mon, 13 Jan 2014 12:29 PM IST
अमर उजाला, वाराणसी
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उदारीकरण के दौर में कोशिश होनी चाहिए की बेटियों की जेब पैसों से भरी हो। बेटियां आत्मनिर्भर होती जाएंगी तो दहेज जैसी समस्या का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। अब तो सक्षम बेटियां माता-पिता का संबल भी बन रही हैं।
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'बेटी ही बचाएगी' मुहिम के तहत 'काफी विद एडिटर' में शनिवार को कुछ ऐसे ही विचार सामने आए। शहर के गणमान्य नागरिकों ने बेटियों को शिक्षित बनाने की पुरजोर वकालत करते हुए कहा कि बेटों को भी स्त्री का आदर करना सिखाने की जरूरत ताकि उसके फांसी पर चढऩे की नौबत न आए।

शिक्षा में बढ़ा बेटियों का दबदबा
शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। मेरे विद्यालय का दो तिहाई स्टाफ महिलाओं का है। प्रबंधन के शीर्ष 40 पदों में से सिर्फ सात पर ही पुरुष हैं। सामाजिक विषमता के कारण सुरक्षा की समस्या है।
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कभी महिलाएं चादर ओढ़े बिना घर से नहीं निकलती थीं लेकिन अब बेरोकटोक घूम रही हैं। कोई बुद्धिजीवी महिला आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़े तो वह सांसद हो सकती है। मगर सबसे ज्यादा जरूरी है बेटी को स्कूल भेजना क्योंकि एक बेटी दो परिवारों को शिक्षित करती है।
-दीपक मधोक, चेयरमैन, सनबीम स्कूल समूह


मुश्किलों में खोज रही हैं अवसर
आशा, प्रबंधन के गुण, सतत चलने और संघर्ष की ताकत की बदौलत बेटियां आगे बढ़ रही हैं। महिलाओं को दबाने और सताने का काम चल रहा है और प्रतिरोध में वे अवसर तलाशकर निखरती जा रही हैं।

पहली बार सबके बीच चारपाई पर बैठी, साइकल चलाना शुरू तो पिता को गांव वालों से ताने सुनने पड़े। बेटे को खाना बनाना सिखाने लगी तो सुनने को मिला कि सोने की कुदाल से मिट्टी क्यों खोद रही हो? लड़कियों को बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए मानसिकता बदली होगी।
-रोली सिंह, शंभूनाथ रिसर्च फाउंडेशन
 
बेटी जितना करेगी, बेटा नहीं करेगा
दंड के भय से लिंग परीक्षण पर बहुत हद तक लगाम लगी है लेकिन उपेक्षा के चलते शैशव अवस्था में ही तमाम बच्चियों की मौत हो रही है। निमोनिया जैसी बीमारी होने पर लोग बेटे का तो इलाज कराते हैं लेकिन बेटियों को उनके हाल पर छोड़ देते हैं।

बच्चियों का ठीक से टीकाकरण तक नहीं कराया जाता है। मेरी दो बेटियां हैं और उनके साथ खुश हूं। कई लोगों को जानता हूं जिनके बेटे कनाडा और दिल्ली में हैं। साल में एक बार आते हैं लेकिन बेटियां रोज हाल पूछती हैं।
-डा. इंद्रनील बसु, चिकित्सक

एक पंख से कैसे उड़ पाएगा समाज
स्त्री-पुरुष दो पंखों की तरह हैं। कोई एक पंख से उडऩे की कल्पना भी कैसे कर सकता है। बेटों और बेटियों में फर्क की रूढि़ तो तोडऩा होगा। यह काम शिक्षा से होगा। वैश्वीकरण के दौर में पैसा सबसे बड़ी ताकत है।

बेटी के जेब में पैसा पहुंचाने का यत्न करना होगा। अभिभावकों को बेटी की शादी करके गंगा नहाने की सोच से उबरना होगा। एनएसएस की छात्राओं के लिए रात्रिकालीन शिविर का प्रस्ताव रखा तो पुलिस और सहकर्मियों ने विरोध किया। यह सफल रहा तो अब सब सहयोग करते हैं।
-डा. अमिता सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ

संस्कारों की संवाहक है नारी
प्रकृति ने बेटियों को संसार का मूल सौंपा है। मां के दया, प्रेम और संस्कार से सिंचित होने पर ही बालक सही राह पर चलता है। इतना होने के बावजूद हम उनकी अवहेलना कर रहे हैं, जिससे वे खुद को निरीह समझने लगी हैं।

कानून कड़े होते जा रहे हैं लेकिन हैवानियत पर रोक नहीं लग रही है। कानून से कुछ नहीं होगा। बच्चों को स्नेह और संस्कार देकर संवेदनशील बनाना होगा तभी सामाजिक सुरक्षा कायम होगी। यह काम सिर्फ मां कर सकती है।
-राधेलाल श्रीवास्तव, पूर्व अध्यक्ष, सेंट्रल बार एसोसिएशन

दहेज के नाम पर हो रहा उत्पीडऩ
ग्रामीण इलाकों में दहेज की समस्या बेहद जटिल हो गई है। इसकी वजह से लोग बेटियों के जन्म से नाखुश होते हैं। अब लोग दहेज की जगह कमाऊ बीवी की तलाश करने लगे हैं। नजरिया बदला है लेकिन सटीक नहीं है।

बेटियों को शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाकर ही इस समस्या से निजात पाई जा सकती है। सफल बेटियों की दास्तान को सामने लाकर समाज को इसके लिए जागरूक किया जा सकता है।
-शैलेंद्र सिंह, उपाध्यक्ष, छावनी परिषद

बेटियां भी चला रही हैं वंश
हम दो बहने ही हैं। एक बहन दुबई में रहती है। पिता ने कभी बेटों की कामना नहीं की। मेरी भी दो बेटियां ही हैं। लोग कहते हैं कि वंश चलाने के लिए एक बेटा भी होना चाहिए। वंश का मतलब लोग टाइटिल से लेते हैं।

अब लड़कियां शादी के बाद भी खानदानी टाइटिल नहीं बदलती हैं। लोग देते हैं कि दहेज के रुपये जोड़ूं या बेटी को पढ़ाऊं। मैं कहती हूं कि शादी की क्या गारंटी। पढ़ा दो, कमाएगी तो तुम्हारी भी सेवा करेगी। महिलाओं की कद्र करना सिखा कर बेटों को बचाने की जरूरत है ताकि वह गलती करके फांसी पर न लटके।
-सुदेशना बसु, चार्टर्ड एकाउंटेंट

जो करती हैं, उसका सम्मान मिले
किसी भी दफ्तर में महिलाएं सर्वाधिक संजीदगी से काम करती हैं। समयबद्ध तरीके से अपना काम निपटाती हैं। उनके कामकाज के तरीके से कम ही लोग नाखुश होते हैं। इसके बावजूद दफ्तरों में उनको भेदभाव झेलना पड़ता है।

उनकी सेवा दफ्तर तक ही सीमित नहीं होती है, बल्कि घर भी ठीक से सहेजती हैं। वे जितना काम करती हैं, उनको उतना सम्मान तो मिलना ही चाहिए। समाज को कम से कम इतना संवेदनशील तो बनाना ही होगा।
-टीपी सिंह, सहायक नगर नियोजक, वीडीए

समानता, सुरक्षा और शिक्षा मिले
बेटियां किसी मामले में पीछे नहीं हैं। पुरुष एकाग्र होकर काम नहीं करते जबकि महिलाएं अपने काम में पूरी तन्मयता दिखाती हैं। इसीलिए हर काम में उन्हें सफलता मिलती है।

विपरीत हालात में भी महिलाएं राष्ट्रपति तक की कुर्सी पर पहुंची हैं। समानता, सुरक्षा और शिक्षा का बंदोबस्त करके बेटियों की हालत सुधारी जा सकती है। यह काम घर से ही शुरू करना होगा।
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-विनोद पांडेय, सामाजिक कार्यकर्ता
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