भाजपा सांसद वरुण गांधी अपने खिलाफ दर्ज तीन मामलों में ऐसे ही बरी नहीं हो गए। इसमें परोक्ष तौर पर सरकार के उन्हीं अधिकारियों की मदद मिल गई, जिन्होंने उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था।
सरकारी अफसरों के ही पक्षद्रोही साबित होने की दशा में वरुण गांधी को अदालत से इसका लाभ मिला।
पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव वरुण गांधी के खिलाफ पीलीभीत में उनकी जन सभाओं के आयोजन पर तीन अलग-अलग मुकदमे दर्ज किए गए थे।
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दो मामलों में उनके खिलाफ जन सुमदाय को भड़काने आदि की धाराओं में मुकदमे दर्ज हुए थे जबकि एक मामले में उनके खिलाफ लोगों को भड़का कर पुलिस पर जानलेवा हमला कराने का आरोप था।
तत्कालीन बसपा सरकार ने वरुण को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ रासुका के तहत भी कार्रवाई की थी।
उस समय पीलीभीत के जिलाधिकारी महेंद्र अग्रवाल ने बतौर निर्वाचन अधिकारी वरुण के खिलाफ मुकदमे दर्ज कराने के निर्देश दिए थे। इसमें एडीएम जमीर आलम और तमाम पुलिसकर्मी इसमें गवाह बने थे।
लेकिन जब अदालत में मामला पहुंचा तो अधिकारी व पुलिसकर्मी सभी मुकर गए।
यहां तक तत्कालीन डीएम महेंद्र अग्रवाल ने मुकदमा दर्ज कराने की बात भी नहीं मानी और तत्कालीन एडीएम जमीर आलम ने अदालत को यह बयान दे दिया कि उन्होंने वरुण गांधी की कोई सभा नहीं सुनी न वह उसमें गए थे।