उस समय जब बच्चे बहुत छोटे थे, उसका पति चल बसा। वह पिता के घर आ गई लेकिन वहाँ का तिरस्कार उससे बर्दाश्त न हुआ।
उस समय जब इस देश में महिलाएँ कामकाज के लिए बाहर नहीं निकल पाती थीं, उसने नौकरी की। जवान विधवा सबको सहज उपलब्ध लगती है। लेकिन उसने किसी को पास फटकने तक न दिया।
वह अपने बच्चों की माँ थी। और पिता भी। दादी भी थी और दादा भी। उनके लिए पैसे भी वही कमाती थी और स्वेटर भी वही बुनती थी। उनकी फ़ीस वही देती थी और खाना भी वही बनाती थी।
उसने अपनी ताक़त को पहचान लिया था और अपने आपको आज़ाद कर लिया था।
उसने दुनिया के सारे हिसाब किताब देख लिए थे। इसलिए उसने बच्चों को पहला पाठ पढ़ाया, " दो और दो गणित में चार होते हैं, दुनिया में नहीं।"
वह पेशे के कुम्हार थी लेकिन कौशल से मूर्तिकार
तब मेरी उम्र कोई छह साल रही होगी। और वह थी साठ साल से अधिक की। वह पेशे के कुम्हार थी लेकिन कौशल से मूर्तिकार। गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती और न जाने किन देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाती थीं।
मैं उसका फ़ैन था। सुबह छह बजे जब घर पर सब सो रहे होते मैं उठकर उसके पास चला जाता। वह कभी मिट्टी में रुई मिलाकर उसे पैरों से रौंदती मिलती तो कभी मिट्टी के लोंदे लेकर उससे मूर्तियाँ गढ़ती हुई।
एक दिन पहुँचा तो वह अपनी साड़ी को घुटनों से ऊपर तक चढ़ाए मिट्टी रौंद रही थी। पैर कीचड़ से सने हुए थे। मैं वहीं खड़ा सोच रहा था कि कैसा लगता होगा ऐसा करना? अचानक उसने मुझे इशारे से अपनी ओर बुलाया। मैं तो तैयार ही था।
मेरे छोटे-छाटे हाथों को उसकी झुर्री वाले हाथों ने थाम रखा था। कोई घंटे भर वह मुझे थामे रही और हम दोनों मिट्टी रौंदते रहे। बीच बीच में बताती रही कि पैर ऐसे रखो, ऐसे मत रखो। रोमांच क्या होता है वह उस दिन मैंने जाना। लेकिन यह बरसों बरस याद रहा। आज भी याद है। कीचड़ में संभलने की सीख हमेशा याद रही। दुनिया की कीचड़ में जब भी पैर डालना पड़ा उसके झुर्री भरे हाथ मुझे थामे रहे।
मैं अभागा कभी उसे शुक्रिया कहने भी न जा पाया। जब यह बात समझ में आई वह जा चुकी थी।
ये उसकी असलियत थी
मां को विदा करने के साथ ही उसने सबके सामने रोना बंद कर दिया था। डर था, कहीं लोग उसे कमजोर न समझने लगें। कहीं ये न समझने लगें कि उसका रोना सहानुभूति के लिए है।
कैसा समाज है न अपना, जो किसी के रोने का हक भी छीन लेता है। पर मजबूत दिखने और होने का अंतर उसे पता था। लोगों की नजर में भले वो खुशमिजाज और बेफिक्र थी लेकिन उसके अंदर बहुत कुछ भरा पड़ा था।
दूसरे बच्चे जब मां के आंचल से खेलते, उसका दिल भर जाता। मांएं अपने बच्चों का हाल-चाल पूछतीं तो उसकी ललचाई नजरें झपकना भूल जातीं।
ये उसकी असलियत थी, जो केवल उस तक ही थी। पर छोटी सी उम्र में मां की कमी ने उसे वो सिखा दिया था, जो शायद उसके साथ के बच्चे आज भी नहीं सिखा पाए थे। मां की कमी ने छोटे भाई की मां समान 'दीदी' और पिता के लिए दोस्त जैसी 'बेटी' बना दिया था।
'ये तो अंडरस्टुड है'
उसका नाम इंदिरा गांधी रखा गया था। किसने? पता नहीं। लेकिन किसी लड़की ने ही।
जुलाई का महीना था। एक छोटे से स्कूल में इंटरव्यू हो रहे थे। वह पार्किंग में स्कूटी से उतरी। लंबा कद, पतली दुबली सी। सफेद सी साड़ी पर डार्क बॉर्डर। एक ऊंचा जूड़ा जो शायद इंदिरा गांधी नाम रखे जाने की वजह रहा हो।
उसकी उपस्थिति इतनी सौम्य थी कि सब ज्यादा से ज्यादा उनके पास रहना चाहते थे। वह सबकी चहेती थी। पूरे स्कूल की। सारे बच्चों की।
कुछ लड़के-लड़कियों के कौतुक उसकी उमर थी। कुछ की उसकी शादी। स्टाफ रूम में अक्सर 'अब तो शादी कर ले' कि आवाजें गूंजती थीं। वो सबको हंस कर टाल देती थी.. तुम लोग ना!!
उसका एक डॉयलॉग था जो वो अक्सर बोलती थी..'ये तो अंडरस्टुड है।'
30-35 साल की एक बेहद सुंदर महिला थी वो। बिना लिप्सटिक और आईब्रो बनवाए। कई साल पहले उसकी शादी हुई थी। मुंम्बई में। एक बेहद पढ़े लिखे और कमाऊ लड़के से। लेकिन वो शादी की दूसरे दिन ही घर लौट आई। पति ने बहुत मिन्नते कीं कि उस रात जो हुआ वैसा कभी नहीं होगा। लेकिन वो दहशत में थी।
वो आई और कभी उसके पास नहीं लौटी। उसे लौटे 10 साल से ज्यादा का वक्त हो चुका होगा। वो अपनी मां के साथ है। ननद की दो बेटियों के साथ।
वो आज भी लोगों की स्मृति में है। हमेशा की तरह कहते हुए.... 'ये तो अंडरस्टुड है'।
मुझे तो अमेरिकन डायमंड एक बार हाथ में लेके देखना है
जब आठवीं में थी, तब पूरे गांव की लड़कियों में अकेली स्कूल जाती थी। रिक्शे पर। हमेशा कहती है, 'जूता रखती थी मैं अपने हाथ में, मजाल है कोई लड़का हाथ लगा दे।'
जब शादी हुई तो पिता ने लड़के से कहा, सुनो तुम्हारे पूरे घर में जितनी ईंट हैं न, उतनी मेरी घर की नालियों में हैं।' लेकिन उसने लड़के को अपनी आठवीं की मार्कशीट दिखाई और लड़के से उसकी मांगी।
आज लड़के की उमर की 68 है और उसकी 60। पति-पत्नी। उन्हें एक ही घर में अलग-अलग कमरों में रहते-रहते करीब 16 साल हो जाएंगे। वह अब बीमार है। झुककर जूते पहनने में कराहने वाला। और कुछ याद न रख सकने वाला। थका और बूढ़ा।
वो जैसे आज भी 16 की है। या शायद उसका जज्बा। उसकी सुबहों का नियम तय है। पति का नाश्ता। खुद का योगा। फिर मालिश। बच्चों के फोन। दोपहर का खाना की तैयारी।
सब सोचते हैं वह 16 साल से कैसे जी रही है। उसका मोबाइल बज रहा है... वह कह रही है, 'होली की टिकट करा लो बेटा। सुनो इस बार तुम्हारे पापा को रैमंड की एक पैंट दिलानी है।' मेरे लिए... 'मुझे तो अमेरिकन डायमंड एक बार हाथ में लेके देखना है।' (फिर फोन पर जोर से हंसती है)
मेट्रो का महिला कोच!
उसे मेट्रो में सफर करना पसंद था। पर्स में रखे मेट्रो कार्ड को स्वाइप करके अंदर जाना। प्लेटफॉर्म पर ये देखना कि कितनी देर में मेट्रो आएगी। इंतजार कर रहे लोग। हमेशा एक नयापन लेपेटे होते थे।
मेट्रो आती और वह इतमीनान से लगभग आखिर में चढ़ती। हमेशा महिला कोच में। ऐसा नहीं है कि बाकी किसी कोच में उसे डर था। या किसी तरह की कोई झिझक थी। लेकिन उसका अपना एक लालच था।
महिला कोच उसके लिए एक दिलचस्प संसार था। महिलाओं की अपनी एक दुनिया। अपने रंग। कई सारी मुस्कुराहटें। कई सारी बातें....घर की, नई नौकरी की, किसी की शादी की, कोचिंग की। बड़ी सारी सी आवाजें होती हैं वहां। कुछ दबी सी भी, कई फोन कॉल्स चल रहे होते हैं धीमी सी आवाजों में।
बेहिसाब फैशन है वहां। लोकल मार्केट से लेकर फॉसिल और तमाम ब्रांड भी हैं। नौकरियां हैं। स्कूल से लेकर बूढ़ी औरते भी हैं। सादी कु्र्तियां हैं तो मैंचिंग की चप्पल भी हैं। और सबके चेहरों पर मैंचिंग सी आजादी। जीने की। कुछ करने की।
वो सफर ऐसे ही तय करती। देखते हुए। सबको जीते हुए। हर बार शक्लें बदलतीं लेकिन अहसास एक सा। शिद्दत से भरा। हर बार नया सा.. महिलाओं की एक छोटी दुनिया..मेट्रो का महिला कोच!